साहित्य सृजन में फेसबुक की भूमिका ✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍

डॉ मधु त्रिवेदी

रचनाकार- डॉ मधु त्रिवेदी

विधा- लेख

साहित्य सृजन में फेसबुक की भूमिका
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मन के भावों ,विचारों का शब्दों में संगुम्फन असम्भव नहीं तो दुरूह कार्य तो है ही । लेखन चाहे गध हो या पध अथवा अन्य कोई विधा । समाज से दूर शून्य में न कल्पित है न उसको लिखा जा सकता है क्योंकि
साहित्य समाजस्य दर्पणम्
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लेखक हो या कवि , हमेशा अपने आसपास जिसे समाज कहते है की घटनाओं से प्रभावित होता है उनको ही शब्दों में कलमबद्ध करता है क्योंकि
"देख तुझे रोता ,दिल भी मेरा रोता
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समाज की हर विसंगति से रूबरू होना ही युगधर्म और कवि कर्म है वो साहित्य को समाज का भास कराता रहे । समाज की हर वेदना ही साहित्य की वेदना है ।

लेखन :

स्वान्त सुखाय होने के साथ लेखन समाज की अच्छाई बुराईयों को छूता है मन मे जो अकुलाहट होती है वो शब्दों में मुखर हो जाती है लेखनी खुद बखुद चलने लगती है समाज एवं
हर पक्ष समाज का भोगने के के बाद समाज लेखनी की आवश्यकता बन जाता है ।
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फेसबुक पर अनेक साहित्यिक ग्रुप है जो साहित्य सेवा कर रहे है और निरन्तर साहित्य सेवा के लिए अग्रसर है ।
फेसबुक पर कई समूह लेखन में सुधार लाते है चाहे वो काव्योदय हो या युवा उत्कृष्ट साहित्यिक मंच या मुक्तक लोक या कवितालोक ,अधूरा मुक्तक या अनछुए जज्बात ।सभी अपने – अपने तरीके से उत्कृष्टता की ओर अग्रसर है साहित्य क्षेत्र में अपने स्तर से कार्यरत है । आभासी दुनियाँ से हट नवोदित कवियों , जिन्होंने ने प्रथम सीढ़ी पर कदम रखा है को मंच प्रदान करने में इन ग्रुपों की भूमिका है । समय -समय पर इन ग्रुप्स के भिन्न शहरों में कार्यक्रम भी होते है । इन ग्रुप्स की बुक्स भी प्रकाशित होती है जिसमें रचनाकारों की कृतियों को स्थान मिलता है ।
लेखिका चूँकि पिछले पाँच वर्ष से फेस बुक यूजर है अतः फेसबुक पर अनेक ग्रुप से जुडी हुई है ग्रुप्स के दैनिक कार्यक्रम लेखनी की धार को पैना करने का काम करते है साथ ही रचनाकर्ता की सोच को जमीन प्रदान करते है । हर वर्ग का व्यक्ति चाहे वह किसी भी व्यवसाय में हो फेसबुक से जुड़ा हुआ है ।
'दैनिक कार्यक्रम के अन्तर्गत हर ग्रुप में दिन के अनुसार अलग -अलग कार्यक्रम है जैसे शब्द युग्म (पानी -पत्ता), पारम्परिक छन्द पर लिखना जैसे घनाक्षरी या मापनी के आधार पर लिखना । इसके अतिरिक्त कक्षा संचालन भी ग्रुप्स की अपनी विशेषताएँ हैं इन साहित्यिक कक्षाओं में साहित्य की बारीकियों को बखूबी सिखाया जाता है ।
इन कुछ ग्रूप्स साय फिलवदीह कार्यक्रम भी चलता है जिसमें लोग एक दिये गये मिसरे के आधार पर दी गयी बहर में तीव्रगामी गति से लिखते है । "रात कब आई , कब गई " का भी पता नहीं लगता ।
इतने सारे ग्रुप्स है कि डॉटा नहीं समेटा जा सकता लेकिन फेसबुक का सबसे ज्यादा लोगों का सबसे बड़ा ग्रुप जो "काव्योदय" कहा जाता है ।
लेखिका की बात फेसबुक पर अति सक्रीय ग्रुप "काव्योदय "के पुरोधा डॉ उदय मणि और श्री कपिल मणि से बात हुई । बात-चीत के दौरान पता लगा कि इस ग्रुप में डेढ़ लाख की आवादी है जो मणि बन्धुओं के कुशल निर्देशन में निरंतर साहित्य के गगन को छूने को अग्रसर है । छ: बैच में लगभग 25 सौ नवांकुर प्रशिक्षित हो चुके है । अब तक 450 फिलवदीह हो चुकी है जिसमें 42 हजार गजल बनी एवं अधिकतम फिलवदीह 22 हजार कमेन्टस की रही । कई साहित्यिक कलाकार विभिन्न अखबारों की शोभा बन चुके है जैसे कुमुद , अरुण शुक्ला , पूनम प्रकाश । इतनी बडी संख्या में संभालने के लिए तीस लोंगों का कुशल कार्यकारी मण्डल है निहायत जिम्मेदार पूजा बंसल , पूनम पान्डेय मेरुदण्ड का कार्य करते है ।

यह लेखिका का "साहित्य सृजन में फेसबुक की भूमिका ""के सन्दर्भ में मेरा तुच्छ प्रयास था।

डॉ मधु त्रिवेदी

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डॉ मधु त्रिवेदी प्राचार्या शान्ति निकेतन कालेज आगरा स्वर्गविभा आन लाइन पत्रिका अटूट बन्धन आफ लाइन पत्रिका झकास डॉट काम जय विजय साहित्य पीडिया होप्स आन लाइन पत्रिका हिलव्यू (जयपुर )सान्ध्य दैनिक (भोपाल ) सच हौसला अखबार लोकजंग एवं ट्र टाइम्स दिल्ली आदि अखबारों में रचनायें विभिन्न साइट्स पर परमानेन्ट लेखिका

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One comment
  1. आदरणीया मधु जी,

    आपने यही लेख एक बार पहले भी साहित्यपीडिया पर प्रकाशित किया हुआ है यहाँ- साहित्य सृजन में फेसबुक की भूमिका

    साहित्यपीडिया आपकी रचनाओं का एक संग्रह है। कृपया एक रचना को एक ही बार प्रकाशित करें।

    इसलिए आपसे अनुरोध है कि इनमे से किसी एक रचना को हटाने का कष्ट करें।

    साहित्यपीडिया को एक बेहतर पटल बनाने में हमारा सहयोग देने का धन्यवाद।

    साभार,
    टीम साहित्यपीडिया