सादगी में आनन्द

Sunder Singh

रचनाकार- Sunder Singh

विधा- कविता

सादगी में आनंद

सादगी का आनंद जो भी जान गया एक बार
फिर नामो-शोहरत की सारी , दौड़ हैं ये बेकार
वैर भाव और अहंकार फिर बचे न कोई शेष
स्वर्ग सरीखा दिखता है , उसको सारा संसार

इक बार कभी दौलत की दौड़ को छोड़के देख
शोहरत की तृष्णाओं के ये बंधन तोड़के देख
कितना आनंद है जीवन में , होगा तभी ये ज्ञान
सादगी से एक बार कभी नाता जोड़ के देख

ये मृग तृष्णाएँ हैं कितनी जीवन में सबके संग
कितनी हैं बेचैनी फिर भी खुशियों के हैं दंभ
कोई दौलत के पीछे तो कोई शोहरत के पीछे
पर मद में नहीं कहीं हैं बस सादगी में आनंद

पर मद में नहीं कही हैं बस सादगी में आनंद

सुन्दर सिंह

30.11.2016

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