‘सहज’ के दोहे -खामोशी

DrRaghunath Mishr

रचनाकार- DrRaghunath Mishr

विधा- दोहे

खामोशी पसरी रही,लोग रहे भयभीत।
दूर-दूर तक मौन थे,छन्द-ग़ज़ल औ गीत।
हम जब तक खामोश थे,खूब चल गई पोल।
ठान लिया अब बोलना,होगा डब्बा गोल।
खामोशी से क्या मिला,समझे गए गँवार।
ख़ुदगर्ज़ों का काफिला,फूला-फला अपार।
कुछ खामोशी में जिएं,कुछ के बाजें ढोल।
'सहज' नहीं आसान यह,कह-सुन गाँठें खोल ।
@ डा०रघुनाथ मिश्र 'सहज'
अधिवक्ता /साहित्यकार
सर्वाधिकार सुरक्षित

Views 15
Sponsored
Author
DrRaghunath Mishr
Posts 52
Total Views 670
डॉ.रघुनाथ मिश्र 'सहज' अधिवक्ता/साहित्यकार/ग़ज़लकार/व्यक्तित्व विकास परामर्शी /समाज शाश्त्री /नाट्यकर्मी प्रकाशन : दो ग़ज़ल संग्रह :1.'सोच ले तू किधर जा रहा है 2.प्राण-पखेरू उपरोक्त सहित 25 सामूहिक काव्य संकलनों में शामिल
इस पेज का लिंक-

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


Sponsored
Related Posts
हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia