सशक्त होती आज की नारी

NIRA Rani

रचनाकार- NIRA Rani

विधा- लेख

स्वयं की शक्ति को संगठित कर सशक्त होती आज की नारी ….

संस्कारो मे नही दायित्वो मे लिपटी है आज की नारी
.दायित्व निर्वाह मे अगर्णी निर्मला नारी अपनी शारीरिक संरचना से ऊपर उठकर अपनी बुद्धी कौशल के बल पर जीत लेना चाहती है हर एक जहॉ को
, छू लेना चाहती है आसमान को उसमे उगे चॉद को
, तोडना चाहती है बंदिशो के तारे समेटना चाहती है खूबसूरत सितारे ,
बीनना चाहती है मोती सागर की गहराई से ,
लहराना चाहती है जीत का परचम ऊचाई पे
अपनी कल्पना के पंखो से उडान भरना चाहती है ,
प्रत्येक सपने को आकार देकर उनमे रंग भरने को आतुर आज की नारी हर छेत्र मे अपने कदम बढा चुकी है

आज वह मात्र पति की अनुगामिनी नही , अनुचरिणी नही ,सहधर्माचरिणी नही अपितु पति के साथ कंधे से कंधा मिलाकर..अपनी शक्ति को संघटित कर एक सशक्त नारी को
परिभाषित करती प्रतीत होती है

छ गज की साडी मे लिपटी छुइमुई नारी जो रसोईघर तक सीमित ..एवं बच्चे पैदा करके उनके पालन पोषण तक सीमित ..थी आज उस छवि को को तोडकर घर से लेकर रोजगार तक सही सामंजस्य एवं तारतम्य बैठाती प्रतीत होती है

इस पुरूष प्रधान समाज मे घर से लेकर रोजगार तक सही तारतम्य बैठाकर उसने रूढधारणा (steriotyping)को तोडने का साहस दिखाया है _
भारत मे यही रूढ धारणा रही है कि घर के सारे काम मसलन झाडू पोछा , बर्तन ,कपडा सब बलिका वर्ग ही करगी और बाहर का काम बालक वर्ग …इस धारणा को सिरे से खारिज करती जा रही है नारी.

अपनी शारीरिक संरचना के कारण हमेशा एक डर के साथ जीती आई है नारी कभी शारीरिक तौर पर तो कभी मानसिक तौर पर हमेशा शोषित होती रही है .भावनात्मक स्तर पर कमजोर पडती नारी को युगो युगो से पुरूष का दंभ प्रताडित करता रहा है ..पर आत्मविश्वास से लवरेज नारी को ' नारी सशक्तिकरण ' के तहत बने अनेकानेक कानून से बहुत बल मिला है

जैसे कण कण सुलगता है , गर्त मे दबा रहता है दशको बाद ज्वालामुखी फटता है ,
कुदंन आग मे तपकर ही खरा होता है
लोहा पिटकर ही सही मायनो मे लोहा बनता है
वैसे ही युगो से तिरस्क्रित , अपमानित एवं गुलामी की आग मे झुलसती नारी का नया अवतार हुआ है जो छडभंगुर नही चिरस्थाई है …..

कहते है स्वयं का स्वाललम्बन ही स्वयं की सहायता है ..

अत: प्रत्येक नारी को स्वयं की सहायता अवश्य करनी चाहिए नही तो इस पुरूष प्रधान समाज मे जरा सी त्रूटी पर कुलटा कुलछनी या अबला की उपाधी दे दी जाती है ..विधवा हो परित्यक्ता हो ..दोष नारी पर ही क्यू ..?आखिर कबतक?

..वर्तमान मे इन सब बातो से ऊपर उठकर उसने अपना नया आसमान तैयार किया है
मानसिक रूप से विकलांग समाज को उसकी विक्रत सोच को अपनी छमता के बल पर बदलने पर मजबूर किया है
हर परिसिथिति मे तटस्थ होकर भावनात्मक स्तर से ऊपर उठकर आर्थिक रूप से मजबूत होती नारी कही से अबला नजर नही आती '
बल्कि हर छेत्र मे अपना विशेष देकर स्वयं को श्रद्धा का पात्र बनाकर .' नारी तुम केवल श्र्द्धा हो' ..ये एक पंक्ति सार्थक करती प्रतीत होती है

नारी शक्ति का अंदाजा वेद ,उपनिषद और ग्र्न्थ पढकर ही लगाया जा सकता है उन्हे देवी की उपाधी यू ही नही दी गई ..

लछ्मी , सरस्वती , दुर्गा सभी रूपो को सार्थक करती नारी साबित करती है कि नारी ही स्र्ष्टी का आधार है

पर कुत्सित बुद्धी वाले आज भी नवरात्री मे कन्या पूजते है देवी अर्चना करते है और गर्भ मे कन्या भूर्ण की हत्या करते है..

पर सरकार द्वारा बनाए कन्या भूर्ण के खिलाफ बनाए कानून से कुछ हद तक इस पर भी रोक लग पाई है
वर्तमान मे नारी हर छेत्र मे चाहे वो खेल कूद का मैदान हो , या दुकान हो , मल्टी मीडिया कम्पनी हो या वाणिज्य बाजार हो , दूर संचार हो या दूरदर्शन की चमकार हो हर जगह अपना परचम लहराती हुइ ओज से ओतप्रोत लहक रही है
आज दो चक्के से लेकर विमान तक चलाने वाली नारी के पंखो की उडान को रोक पाना मुश्किल ही नही नामुमकिन है .

गुरूर है खुद पर ….खुद के वजूद पर कि मै एक नारी हू ..आजकी नारी हूं ..जो अपनी संवेदनाओ को अपनी लेखनी के जरिए स्फुटित करने की शक्ति रखती हू अपनी मर्यादा मे रहकर अपनी बात कहने का दंभ रखती हू ..
कभी संयम का जहर पीती हू
कभी शोलो की आग मे जलती हू
कभी अपमान का घूंट पीती हूं
कभी मानसिक प्रताडना सहती हूं
फिर भी आज मै सबला हूं
ये कहने का फख्र रखती हूं कि आज पुरुष भी नारी के बिना उतना ही निर्रथक और बेबस है जितनी की नारी
नीरा रानी

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NIRA Rani
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साधारण सी ग्रहणी हूं ..इलाहाबाद युनिवर्सिटी से अंग्रेजी मे स्नातक हूं .बस भावनाओ मे भीगे लभ्जो को अल्फाज देने की कोशिश करती हूं ...साहित्यिक परिचय बस इतना की हिन्दी पसंद है..हिन्दी कविता एवं लेख लिखने का प्रयास करती हूं..
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