सरस्वती-वन्दना (गीत)

हरीश लोहुमी

रचनाकार- हरीश लोहुमी

विधा- गीत

सरस्वती-वन्दना
********************

हृदयांगन में चरण कमल रख कर उपकृत कर दे !
वीणावादिनि ! साधकजन को सृजन मनोहर दे !

धुन–लय-तान मधुर मुखरित हो,
जन-मन को ले मोह,
उन्नत हो आरोह स्वरों का
हिय-प्रिय हो अवरोह ।

झंकृत हों उर-तार साधना में नव-रस भर दे !
वीणावादिनि साधकजन को सृजन मनोहर दे !

हिल-मिल साधक रहें परस्पर,
रहे न तनिक बिछोह,
हृदयस्थल पुलकित कर दे माँ,
दूर रहे विद्रोह ।

तम हर नेह दीप्ति से उर को आलोकित कर दे !
वीणावादिनि ! साधकजन को सृजन मनोहर दे !

*************************************************
हरीश चन्द्र लोहुमी, लखनऊ (उ॰प्र॰)
*************************************************

Sponsored
Views 1,432
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
हरीश लोहुमी
Posts 24
Total Views 2k
कविता क्या होती है, नहीं जानता हूँ । कुछ लिखने की चेष्टा करता हूँ तो फँसता ही चला जाता हूँ । फिर सोचता हूँ - "शायद यही कविता हो जो मुझे रास न आ रही हो" . कुछ सामान्य होने का प्रयास करता हूँ, परन्तु हारे हुए जुआरी की तरह पुनः इस चक्रव्यूह में फँसने का जी करता है ।

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia
One comment