सम-सामयिक दोहे

Laxminarayan Gupta

रचनाकार- Laxminarayan Gupta

विधा- दोहे

सहिष्णु नर होता सफल, पकड़ सबूरी डोर|
असहिष्णु नर ढोर सम, चरता चारों ओर|

नगर, ग्राम, घाट, तट, सरिता की सौगात|
नारी समपुरण तभी, सीरत भी हो साथ|

बोया पेड़ बाबुल का, अपने आंगन बीच|
कांटे खुद पैदा किये, तुष्टिकरण को सींच|

महिलाएं बनकर सबल, साथ रखें हथियार|
आत्मरक्षा हेतु है, यही सिद्ध उपचार|

गाँधी टोपी पहनकर, दिया कबीरा रोय|
नेताओं की भीड़ में, गाँधी दिखा न कोय|

पड़ी सरों में भाँग है, पी-पी कर सब मस्त|
राम बचाए देश को, हुआ देश और त्रस्त|

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Laxminarayan Gupta
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मूलतः ग्वालियर का होने के कारण सम्पूर्ण शिक्षा वहीँ हुई| लेखापरीक्षा अधिकारी के पद से सेवानिवृत होने के बाद साहित्य सृजन के क्षेत्र में सक्रिय हुआ|
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3 comments
  1. वाह ! अच्छे भाव हैं किन्तु अंतिम दो दोहों के अतिरिक्त सभी में शिल्पगत त्रुटियाँ हैं. आपके इस प्रयास के लिए बहुत बधाई.सादर.

    • अशोक कुमार जी कृपया त्रुटियाँ इंगित करने का कष्ट करें ताकि मेरी जानकारी में आयें