*”समाज निजता में बाधक है”*

Mahender Singh

रचनाकार- Mahender Singh

विधा- कविता

मैं कह न सका,
हिचक मेरे मन में थी,
वह सह न सकी,
काफ़िर
कह आगे बढ़ गई,
मन उसको भी था,
शर्म औरत के सोलह श्रृंगार का हिस्सा है,
वह भी हिचक गई,
न मैं जी सका,न उसे मौत आई,
.
यह मेरे समाज का बंद आईना है,
हमारी रीति रिवाज परम्परा जिंदा रहनी चाहिए,
"मुर्दा तैरता है,जिंदा आदमी डूब जाता है"

Sponsored
Views 11
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
Mahender Singh
Posts 70
Total Views 1.6k
पेशे से चिकित्सक,B.A.M.S(आयुर्वेदाचार्य)

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia