समर्पण

निहारिका सिंह

रचनाकार- निहारिका सिंह

विधा- कविता

तुम संपूर्ण देश की आशा हो ,
तुम प्रति प्रस्फुटित भविष्य की अभिलाषा हो।
तुम साहस ,सौहार्द का मापदंड हो ,
हे वीर !तुम्हारी आन समर्पण हो ।।

तुम हो ज्वाला हर अत्याचारों की,
तुम उपचार हर अबला के घावों की।
तुम हम बहनों की राखी हो ,
तुम तेज हो हर माँ के आहों की ।।
हे शौर्य ! तुम्हारा लक्ष्य समर्पण हो ।
हे वीर ! तुम्हारी आन समर्पण हो ।।

जो प्रहार किये हमपर वो तुम भूलो नही ,
विष कोई निज शब्दों में तुम घोलो नही ।
सिर जो उठ जाये उन्हें वहीं पर तुम काट डालो,
तुम्हारे भाइयों से किया अभद्र व्यवहार तुम भूलो नही ।
उनका कृत्य अक्षम्य है
तुम्हारे हर वाक्य में गर्जन हो ।
हे वीर ! तुम्हारी आन समर्पण हो ।।

निहारिका सिंह🇮🇳

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निहारिका सिंह
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स्नातक -लखनऊ विश्वविद्यालय(हिन्दी,समाजशास्त्र,अंग्रेजी )बी.के.टी., लखनऊ ,226202।

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