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Rishikant Rao Shikhare

रचनाकार- Rishikant Rao Shikhare

विधा- लेख

एक सेकेण्ड जो मौत से बचा हो।
एक मिनट जिनकी ट्रेन छूट गयी हो।
एक घंटे जो किसी का इंतज़ार किया हो।
एक दिन जो पीड़ा के मारे दर्द से कराह रह हो।
एक वर्ष जो अपना मूल्यवान ज़िन्दगी व्यर्थ कर दिया हो।

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Rishikant Rao Shikhare
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चुराकर दिल मेरा वो बेखबर से बैठे हैं;मिलाते नहीं नज़र हमसे अब शर्मा कर बैठे हैं;देख कर हमको छुपा लेते हैं मुँह आँचल में अपना; अब घबरा रहे हैं कि वो क्या कर बैठे हैं

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