समयातीत

Neeraj Chauhan

रचनाकार- Neeraj Chauhan

विधा- कविता

जीवन की वेदी पर
दुखाग्नि के हवन में
समय की आहुतियाँ
देता रहूँगा बार-बार

करता रहूँगा भस्मीभूत
तुम्हारे हर एक दारुण्य को
उठाऊंगा तुम्हे समय का हवाला देकर
बार बार..

डरना मत , मैं अभी हूँ
हाँ, चक्रव्यूहों में हूं
हाँ, कोरवों की सेना
मिलकर मुझे परास्त करेंगी
घेर लेंगी मुझे अकेला पा
हँसेगी , अठ्ठाहस करेंगी
उतारू होंगी, मेरे टुकड़े करने पर
मेरी दशा पर..

पल पल जब भी गिरूंगा
जब जब आंसुओ में मिल रक्त बहेगा
तब तब समय बाध्य करेगा
मुझे मरने को..

कोई आता है,
समयातीत
जो बहता है
मेरी धमनियों में .. शिराओं में
टूटे मेरे अस्थि पंजर मेरी भुजाओं में
मरते हुए भी जो जिन्दा रखता है मुझे
चुनौती दे देता है जो एक साथ
जो सैकड़ों कौरवों को,
जिसके सुदर्शन की छाया
ढाप लेती है संपूर्ण धरा को
मुझ सहित,
और फिर समय मुझे
बौना नज़र आता है..
मैं फिर जी उठता हूं!
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Neeraj Chauhan
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कॉर्पोरेट और हिंदी की जगज़ाहिर लड़ाई में एक छुपा हुआ लेखक हूँ। माँ हिंदी के प्रति मेरी गहरी निष्ठा हैं। जिसे आजीवन मैं निभाना चाहता हूँ।

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