समझ बैठा था बुत लेकिन….

संजय सिंह

रचनाकार- संजय सिंह "सलिल"

विधा- गज़ल/गीतिका

झुकी थी जो अभी तक, वह निगाहें खेलती सी है l
समझ बैठा था बुत लेकिन ,जुबा भी बोलती सी है ll

खड़ी ऊंची हवेली जो, बहुत कुछ कह रही जग से l
घरों की बंद जो खिड़की, कहानी खोलती सी है ll

मिटाने में लगे एक पल, उसे हस्ती समंदर की l
तेरी औकात हे शबनम ,सुबह भी तोलती सी है ll

समय का खेल है ऐसा, पड़ा है खेलना सब को l
उठाओ हाथ देखो भी ,लकीरें बोलती सी हैं ll

रखो तुम राज सब अपने, दबा वक्त की किताबों में l
सवालों की फसल फिर ए हवाएं रोपती सी है ll

बचा रखा "सलिल" हमने बिखरने से ज़माने को l
कहीं आए ना फिर तूफा ए बातें चीरती सी है ll

संजय सिंह "सलिल"
प्रतापगढ़ ,उत्तर प्रदेश l

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संजय सिंह
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मैं ,स्थान प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश मे, सिविल इंजीनियर हूं, लिखना मेरा शौक है l गजल,दोहा,सोरठा, कुंडलिया, कविता, मुक्तक इत्यादि विधा मे रचनाएं लिख रहा हूं l सितंबर 2016 से सोशल मीडिया पर हूं I मंच पर काव्य पाठ तथा मंच संचालन का शौक है l email-- sanjay6966@gmail.com, whatsapp +917800366532

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