सफर ये जो सुहाना है ।

कृष्ण मलिक अम्बाला

रचनाकार- कृष्ण मलिक अम्बाला

विधा- कविता

सफ़र ये जो सुहाना है
होनी अनहोनी तो एक बहाना है
डूबते को तूने बचाना है
गिरते को उठाना है
बन जाओ पर्वत शिला तुम
ऐसा मुकाम तुझे पाना है
मुश्किलों में संभलते जाना है
हंसते हंसते खुशी के गीत गाना है
राह कैसी भी हो पर नेक हो
राही ने चलते जाना है
खफा हुए मुद्दतों से जो
तूने कोशिश कर मिलाना है
कर सका तू दुनिया के वास्ते कुछ
समझना हुआ सफल तेरा धरा पे आना है
पर इस उलझन में तूने
उस परमपिता को नहीं भुलाना है
मुमकिन नहीं मिले जो हमें पाना है
फिर भी तूने कोशिश करते जाना है
क्योंकि
सफर ये जो सुहाना है
होनी अनहोनी तो एक बहाना है..

© के.एस. मलिक 01.04.2014

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कृष्ण मलिक अम्बाला
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कृष्ण मलिक अम्बाला हरियाणा एवं कवि एवं शायर एवं भावी लेखक आनंदित एवं जागृत करने में प्रयासरत | 14 वर्ष की उम्र से ही लेखन का कार्य शुरू कर दिया | बचपन में हिंदी की अध्यापिका के ये कहने पर कि तुम भी कवि बन सकते हो , कविताओं के मैदान में कूद गये | अब तक आनन्द रस एवं जन जागृति की लगभग 200 रचनाएँ रच डाली हैं | पेशे से अध्यापक एवं ऑटोमोबाइल इंजिनियर हैं |

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