सपना

तेजू जांगिड़

रचनाकार- तेजू जांगिड़

विधा- कहानी

जब कमलपुर गाँव में बस रुकी तो काव्या ने गाँव में कदम रखा तो वह अन्दर ही अन्दर बहुत खुश थी क्योंकि वह काफी समय के बाद अपने गाँव लौटी थी | हितेश भी साथ में था |गाँव में एक मंदिर है जो ज्यादा समय बंद ही रहता है | क्यों? पता नहीं | ठीक मंदिर के सामने कुछ दुकानें हैं, वहाँ लगभग हर वह वस्तु मिल जाती है जिसकी वहां के लोगों को जरूरत होती है | काव्या ने वहां से कुछ खरीदा और चलने लगी | (क्योंकि गाँव से घर जाने का कोई वाहन सुविधा नहीं थी) | चलते-चलते उसने अपने विद्यालय को देखा तो उसकी पुरानी यादें ताजा हो गई | वह भावुक हो गई | काव्या ने कहा –“देखो हितेश! इसी विद्यालय में मैं पढ़ी हूँ | इसमे मैंने अपनी जिंदगी के सबसे खूबसूरत पल बिताए है |”

“अच्छा, तो तुम इस कारण भावुक हो?” हितेश ने पूछा |
“हाँ, मुझे मेरी दोस्त की याद आ गई | उस भुक्कड़ प्रिया की जिसे हर समय भूख लगी ही रहती थी और मेरा खाना भी मेरा खाना भी नहीं छोड़ती थी |” काव्या ने भावुकता के साथ मुस्कराते हुए कहा |
“ओह्ह, |”
“हां”
“अब वह कहाँ है?”
“नहीं है अब वह इस दुनिया में |” काव्या के आँखों से आंसू टपकने लगे |
“ओह्ह, क्या हुआ था उसे?”
“केंसर था उसे |” काव्या फूट-फूट के रोने लगी |
हितेश ने जैसे तैसे कर काव्या का रोना बंद कराया |
चलते चलते वे दोनों बाते कर रहे थे | हरी काका अपने खेत में काम कर रहे थे रास्ता वहीं से होकर गुजरता था | हरी काका ने काव्या को देखते ही पहचान लिया और बोले – “अरे बिटिया बड़े दिनों बाद गाँव की याद आई ?”
“क्या कहूँ काका आने का जी तो बहुत करता पर… | वैसे काकी कहाँ है?”
“आरी ‌‍‌‌‌ ओ रामेशीया की अम्मा! देख तो भुवन की बिटिया आई है|” हरी काका ने अपनी पत्नी को आवाज लगाकर बुलाया |
काकी कुछ दूर ही काम कर रही थी तो आवाज सुनते ही आ गई |
“कैसी हो काकी?” काव्या ने पूछा |
“अच्छी हूँ बिटिया |”
ऐसे ही काफी समय बातें चलती रही और वहां से आगे बढे और अपने खेत में कदम रखा तो काव्या के सामने वह सब कुछ किसी फिल्म की तरह दिखने लगा | उसे याद आ रहा था जब वह इन खेतों में काम करती थी | और जब वह विद्यालय से घर आती तो बाबा उसे अपने साथ खेत में ले जाते थे और वहां अड़ावे (जहां कोई फसल नहीं बोई जाती हो और ख़ास तौर से पशुओं के चरने के लिए छोड़ी गई भूमि ) में भेड़ें हांका करती थी | पर समय कभी एक सामान नहीं रहता क्योंकि परिवर्तन प्रकृति का नियम है |
हितेश साथ में मौन अवस्था में यात्रा कर रहा था |
काव्या ने अपने घर के ओटे पर पैर रखा ही था की सामने उसका छोटा भाई आया और अपनी दीदी से गले लगा और फिर घर में गए | अन्दर भुवन और काव्या की अम्मा भी काव्या के पास आए | हितेश ने भुवन भुवन को प्रणाम किया |
“खुश रहो बेटा|” भुवन ने आशीर्वाद दिया |ऐसे ही काव्या ने भी अपने अम्मा बाबा से गले मिली और कुशलक्षेप पूछा | काव्या ने पूछा – “अपनी खेती कैसी चल रही है अम्मा?”
“क्या बताऊँ बिटिया मैं और तुम्हारे बाबा तो अब बूढ़े हो गए है अब पहले जितना काम हम से नहीं होता है |” काव्या की अम्मा ने कुछ परेशान भाव से कहा |
“हाँ अम्मा | पर कैलाश हाथ नहीं बंटाता?”
“वह तो इसकूल चला जाता है और घर आकर भी ज्यादा खेत में नहीं आता है |”
“ओह्ह | तब तो उसे समझाना पड़ेगा | काव्या ने मुस्कराते हुए कहा | ऐसे ही वार्तालाप निरंतर जारी था |
तभी हितेश काव्या के कमरे में कदम रखता है तो चारों और दीवालों पर काव्या के बनाये चित्रों को देख भोंचक्का रह गया | अन्दर कपाट खोलकर देखता है तो अन्दर एक डायरी पड़ी दिखी जिसपर कुछ धुल के महीन कण जमे हुए है | हितेश उसे साफ़ करके उसके पन्ने पलटता है और परत दर परत पलटता है और भावुक हो जाता है |
दूसरी सुबह वे दोनों वापस शहर जा रहे थे तो सभी ने उनको ख़ुशी के साथ विदा किया और कुछ दुःख भी था | वे दोनों उसी रास्ते गाँव तक पैदल ही चले और गाँव की उस मंदिर के सामने वाली दुकान से कुछ सामान खरीदा और बस की प्रतीक्षा करने लगे | बस आई और काव्या ने फिर अपने गाँव कमलपुर से विदा ली |
शहर में घर पहुँचाने की दूसरी सुबह हितेश ने काव्या के सामने कुछ पैक किया हुआ रखा, कहा – “खोलो इसे काव्या तुम |”
काव्या ने खोला तो वह हाव विभोर हो गई और कुछ कहना ही चाह रही थी तभी हितेश बोला – “काव्या! तुम्हे लिखना अच्छा लगता है न, लेखिका बनना तुम्हारा सपना था न? ये लो डायरी और कलम |”
“पर हितेश ये तुम्हें कैसे पता?”
“मैंने तुम्हारे कमरे में तुम्हारी वह पुरानी डायरी पढ़ी इसलिए अब ये लो डायरी और कर लो अपना सपना साकार।"
तब उसके पास हितेश को कहने के लिए कोई शब्द नहीं था ।
– तेजू जांगिड़

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