सजाया ख्वाब काजल सा वो आन्सू बन निकलता है

निर्मला कपिला

रचनाकार- निर्मला कपिला

विधा- गज़ल/गीतिका

सजाया ख्वाब काजल सा वो आन्सू बन निकलता है
उजड जाये अगर गुलशन हमेशा दिल सिसकता है

जमाने भर की बातें हैं कई शिकवे गिले दिल के
सुनाउं क्या उसे जो फासला रखकर गुजरता है

न आयेगा कभी वो लौट कर भगवान ‌के‌ घर से
इसी को सोच कर दिल‌ मे वो छाले सा उभरता है।

जहालत छिप नही सकती वो ढींगें मार ले कितनी
घडा आधा भरा हो खूब ऊपर को उछलता‌ है

जलाकत से जहानत नही है लेना देना ‌कुछ
जो जीवन मे कभी तपता नही वो कब निखरता है

जलाये आशियां अपना जो खुद अपनेही हाथों से
नदामत मे दुखी ताउम्र् वो दर दर ‌भटकता है

न करना अब गिले शिकवे न करना बात गैरों की
मुहब्बत के लिये भी वक्त् यूं कब रोज मिलता है

निभाता कौन उल्फत है यहां ताउम्र सोचो तो
जिसे भी दोस्त समझो वही दुश्मन निकलता है

खुशी तक्सीम करता है गमों को जोड देता है
वो जीवन के गनित मे जब भी निर्मल से बहसता है

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निर्मला कपिला
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लेखन विधायें- कहानी, कविता, गज़ल, नज़्म हाईकु दोहा, लघुकथा आदि | प्रकाशन- कहानी संग्रह [वीरबहुटी], [प्रेम सेतु], काव्य संग्रह [सुबह से पहले ], शब्द माधुरी मे प्रकाशन, हाईकु संग्रह- चंदनमन मे प्रकाशित हाईकु, प्रेम सन्देश मे 5 कवितायें | प्रसारण रेडिओ विविध भरती जालन्धर से कहानी- अनन्त आकाश का प्रसारण | ब्लाग- www.veerbahuti.blogspot.in

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