शेष तुम विशेष तुम!

मुकेश कुमार बड़गैयाँ

रचनाकार- मुकेश कुमार बड़गैयाँ

विधा- कविता

अस्तित्व में तुम अभी
अस्तित्व भी न रहे पर तुम रहोगे
जब सब थमेगा बस तुम बहोगे
शेष तुम विशेष तुम
आज तुम ,कल भी तुम
अंत तुम अनंत तुम
अंत के अनंत तुम
हे! समय तुम शाश्ववत
सब समाहित तुम में हैं
जन्म और मृत्यु के साक्षी तुम
प्रारंभ तुम —-अंत कहां हैं? क्या पता—क्षितिज तो एक कल्पना है!
और अब सामर्थ्य नहीं
कि बांध दूं परिभाषा में
कल्पना और यथार्थ में
एकमात्र सत्य तुम्हीं तो हो—
जब कुछ नहीं था तुम ही तो थे
सब कुछ तुम ही तो हो
बस तुम ही रहोगे
जब सब थमेगा
बस तुम ही बहोगे।

मुकेश कुमार बड़गैयाँ

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I am mukesh kumarBadgaiyan ;a teacher of language . I consider myself a student & would remain a student throughout my life.

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