शेर.. जीवन और प्रेम पर

Mahender Singh

रचनाकार- Mahender Singh

विधा- शेर

तू चाहे रूठ जितना,
मैं मना ही लूँगा,
चाहे जितने बदल भेष,
आखिर पहचान लूँगा,

हो भले चाहे जितने पड़ाव,
पार कर ही लूँगा,
उनको सजावट तेरी मान लूँगा,

पर सह न पाऊंगा,
जुदाई तेरी,
खुद से क्या पहचान दूँगा,

"अ जिंदगी",
तुझ से महेंद्र रोशन है,
मृत्यु तेरा आगोश,
सब तरफ अंधकार में,
कैसे?
झलक दिखा और देख पाऊंगा,

दूसरों के हाथ में,
फिर भी
विवेक रुप दीपक,
प्रज्वलित करके जाऊंगा,

ज्योति जगे,
दीप जले,
घर घर हो उजियारा,
सबमें सन्मति जगे,
सदा जीव जीवन सबल और धन्य रहे,

डॉ महेन्द्र सिंह खालेटिया,

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Mahender Singh
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पेशे से चिकित्सक,B.A.M.S(आयुर्वेदाचार्य)

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