शायरी

वेदप्रकाश रौशन

रचनाकार- वेदप्रकाश रौशन

विधा- शेर

कभी नैन तरसते थे किसी के दीदार को,
अरसे बीत गए, लोग भी बदल गए,
मगर दिल आज भी खिल उठता है,
देखकर अपने प्यार को…|

तेरी एक इनकार से,
मेरी सारी हसरतें मर गए,
बेवफा तुझसे क्या,
हम तो अपनी चाहत से ही हार गए|

उसे ना पाकर आज,
हम खुद बेजान हो गए,
अब तो सिर्फ यही सोंचता हूँ,
आँखों से मोहब्बत पढ़कर भी,
वो क्यूँ अनजान हो गए|

मेरी सुबह की चैन,
रातों की आराम थी वो,
खामोश मैं था की,
बता नहीं सका किसी को,
मेरी तो जान थी वो…|

तुम भले खुश रह लो,
किसी और की बाँहों में,
मै आज भी जीना चाहता हूँ,
तेरी जुल्फों की छाँहों में…..||

चाहा तो कइयों को,
चाहत न बना सके,
सिर्फ तू बसी है दिल में मेरी,
किसी और को ये जगह न दे सके|

हर जख़्म वक़्त का गुलाम होता है,
कभी किसी को हरा कर जाता है
तो किसी को भर जाता है|

मेरी ख़ामोशियों को गुमान न समझना,
डर मुझे है, महफ़िल में तेरे बदनाम होने की,
अपने दिल में छुपी चाहत को एहसान मत समझना|

तेरे मिलने का कोई गम नहीं मुझे,
तेरी मुस्कुराहट से ही मेरी ज़िन्दगी गुजर जाएगी|

वेदप्रकाश रौशन

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वेदप्रकाश रौशन
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हिंदी का उपासक, सहित्य प्रेमी । सांस्कृतिक बचाव के लिए एक छुपा हुआ छोटा सा कलम का पूजारी । विभिन्न विधाओं में रूचि के अनुसार लेखन करता हूँ । लेख तथा कहानी विशेष तौर से लिखना पसंद करता हूँ ।।

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