शाम डरते हुए

विजय कुमार नामदेव

रचनाकार- विजय कुमार नामदेव

विधा- गज़ल/गीतिका

बेशर्म की कलम से

शाम डरते हुए

रोज कितने मुख़ौटे लगाता हूँ मैं।
हर रिश्ते को दिल से निभाता हूँ मैं।।

तुम जिन्हें चाँद तारे या सूरज कहो।
उनको शाला में नित ही पढ़ाता हूँ मैं।।

पूछते लोग खुशबू ये कैसी कहो।
तेरी यादों से अक्सर नहाता हूँ मैं।।

शेर बनकर फिरूँ सारे जग में मगर।
शाम डरते हुए घर को आता हूँ मैं।।

कहने को बेशरम हूँ मगर जाने क्यों।
बेसबब याद सबको ही आता हूँ मैं।।

विजय नामदेव "बेशर्म"
गाडरवारा मप्र
09424750038

Views 82
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
विजय कुमार नामदेव
Posts 24
Total Views 8.1k
सम्प्रति-अध्यापक शासकीय हाई स्कूल खैरुआ प्रकाशित कृतियां- गधा परेशान है, तृप्ति के तिनके, ख्वाब शशि के, मेरी तुम संपर्क- प्रतिभा कॉलोनी गाडरवारा मप्र चलित वार्ता- 09424750038

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia