शहीद दिवस

Tejvir Singh

रचनाकार- Tejvir Singh

विधा- कविता

🙏 अमर शहीदों को शत्-शत् नमन् 🙏
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भगतसिंह सुखदेव राजगुरु,क्रांतिवीर निराले थे ।
आजादी के महा-समर में,कूद पड़े मतवाले थे।

कांप उठे थे राजतन्त्र,गोरों की चूल लगीं हिलने।
गंगा-जमना-सरस्वती ज्यों,धरनी पर आईं मिलने।

देख-देख वीरों की भृकुटि,कम्पित चंहु दिशाएं थी।
देशप्रेम का दर्प मुखों पर,अद्भुत-सी आभाएँ थी।

नैनों में ज्वालाएँ अगणित,मुद्रा जनु चमके शमशीर।
चिंगारी-से दहक रहे हों,कुसुम अधखिले-से गम्भीर।

माथे पर कोई शिकन नहीं,ना खौफ़ कहीं था नैनों में।
"जय हिन्द" का उद्घोष सुनाई,देता था बस बैनों में।

देख जुल्म की हद वीरों पर,रोया है धरती-अम्बर।
समय पूर्व फाँसी दे डाली,होने ना दी कहीं खबर।

रातों-रात हुई अनहोनी,गवाह बना सतलुज का तीर।
भारत माता को दे डाली,जनम-जनम की भारी पीर।

भारत माँ चीत्कार उठी इन,वीर सपूतों को खोकर।
अमर कर गए नाम जगत में,बांकुर बलिदानी होकर।

आदिकाल तक परम्परा बन,साथ लहू के दौड़ेगी।
वीर शहादत इतिहासों की,धारा अविरल मोड़ेगी।

बच्चा-बच्चा भगतसिंह बन,माँ की रक्षा रत् होगा।
देशभूमि पर मर-मिटना ही,पूजा,वन्दन,व्रत होगा।

हे ईश्वर!सबको सद्बुद्धि,सद्वृत्ति का वर देना।
सद्विचार के साथ हृदय में,सारे सद्गुण भर देना।

'तेज' भारती का भारत की,अग्रिम पीढ़ी पर बरसे।
वीर सपूतों को पाकर हो,धन्य हिन्द हिय से हरषे।

यश-गाथाओं का श्रुति-वाचन,किया करेगा हिंदुस्तान।
शत्-शत् नमन् वीर बलिदानी,हिन्द धरा की हो पहचान।
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तेजवीर सिंह 'तेज'✍

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