शहर और महानगर की दोपहर

prerna jani

रचनाकार- prerna jani

विधा- लेख

शहर और महानगर की दोपहर

महानगर से शहर लौटने पर मेरा एक लेख !
कुदरत का करिश्मा भी बडा अजीब है वही सुबह ,
दोपहर , शाम , रात पर इन दोपहरों का खेल शहर और महानगर
में बहुत ही निराला है | शहर में रोज दोपहर होती थी रोज शाम और रोज सुबह | महानगर की घडी में समस्या नज़र आती है | ये अपने हिसाब से सुबह से शाम कर लेती कई सप्ताह बीत जाने के बाद अनुभव होता अरे ! आज दोपहर भी हुई है | वो शहर की दोपहर होती थी जब मनोरंजन हुआ करते व अख़बार दोबारा पड़ने का
कार्यक्रम होता था |हर एक खबर – आज वर्षा के पानी में पुलिया बहना , नेताजी के द्वारा सड़को का भूमिपूजन , आदि मतलब उस दिन अख़बार पुराना लगने लगता था | हर एक पन्ने ऐसे जैसे ५ रुपये
की कीमत वसूल लिए हो | आज कुछ पुराने अख़बार मिले आलमारी में रखे | किसी दिन सोच के लाई थी आज इसको पढूगी दफ्तर से आके और हम रख देते है एक ढेर में जिसपे मैंने कुछ पंक्तिया
लिखने की कोशिश की –
" दरवाजो में पड़े अख़बार , रोज वही मुरझा जाते पडे ,
शिकायतें भरी नज़रें रहती, क्यों न ला के बिखर देते सिरहाने हवाये
जो पलटती पन्ने "
यहाँ की दोपहर उदास सी है | दरवाजे किसी के आधे खुले आधे बंद |
सब व्यस्त है अपने दफ्तरों में | कभी आते जाते सिर्फ अजनबी गुजर जाये तो कभी बिस्तर पर सारी दिन की थकान किश्ते अदा करने लगती | यहाँ दोपहर और रात एक जैसे होते है -सन्नाटे और सुकून बस फर्क है सर्फ उजालो का | गर्मियों में शहर की दोपहर में दूरदर्शन देखने की अलग ही यादे थी – कभी हेमा जी के डांस तो कभी
किशोर दादा व लता दीदी के गाने और भी मनोरंजक हो जाता था
रविवार जब आता था आपकी फरमाइश -जिसमे लोग अपने अपने पसंदीदा गाने सुनने उत्सुक रहते और फरमाइश करते – रेखा ,
सोनू ,मोनू और उनके दोस्त जिल्हा गोंदिया से फिर पेश होता था – " 'चला जाता हूँ किसी की धुन में', 'ज़िन्दगी गले लगाले' जैसे गाने
जो दूर गाँव, शहर , खेतो तक अपनी आवाज़ में समा बांध लेता था ,
कही न कही दूरदर्शन के माध्यम से हम भी डुब गए साथ लगता था |
आज सब दोपहर में अपने धुन के अलग ही तराने है |
दोपहर पर मुझे ये पंक्तिया याद आई ,
"एक अकेला इस महानगरी में , रात में और दोपहर में ,
ढूंढता फिरता है सुकून भरी दोपहरे "

प्रेरणा जानी

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prerna jani
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