शरद ऋतु के जंगल

Rita Singh

रचनाकार- Rita Singh

विधा- कविता

शरद ऋतु के जंगल

भोर की मुस्काती बेला में
कोहरे की पतली सी चादर में
रवि रश्मि के स्वागत को आतुर
घने घने से मिले मिले से
शांत भाव से खड़े हुए से
कुछ ठिठुरते से लगते हैं
कुछ कपकपी करते से
एक अबोध शिशु की भाँति
कितने निश्छल लगते हैं
शरद ऋतु में घने जंगल ।
धूप बिखरते ही हँसते से
ओस कणों से मुँह धोकर
हरे भरे खिले खिले से
मस्तमौला पवनों के संग
सर-सर सर-सर मस्ती करते
शरद ऋतु में मस्त जंगल ।
साँझ ढले वन तपस्वी से
लगते मानों तप करते से
या फिर हैं कुछ सहमे सहमे से
रात रानी से डरे हुए से
साँय साँय की आवाज़ों से
हो भयभीत सोए हुए से
शरद ऋतु के भरे जंगल ।

डॉ रीता
आया नगर,नई दिल्ली

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Rita Singh
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नाम - डॉ रीता जन्मतिथि - 20 जुलाई शिक्षा- पी एच डी (राजनीति विज्ञान) आवासीय पता - एफ -11 , फेज़ - 6 , आया नगर , नई दिल्ली- 110047 आत्मकथ्य - इस भौतिकवादी युग में मानवीय मूल्यों को सनातन बनाए रखने की कल्पना ही कलम द्वारा कुछ शब्दों की रचना को प्रेरित करती है , वही शब्द रचना मेरी कविता है । .

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