“शक लगता है”

Mamta Pandey

रचनाकार- Mamta Pandey

विधा- गज़ल/गीतिका

"शक लगता है"
पति को प्रिय बुलाॐ तो,उन्हें शक लगता है,
बात थोड़ी नमकीन हो,उन्हें मेरा हक लगता है…

देर सबेर ही सही,हमें पहचान गये,मालूम तो हुआ,
बात जो निकली कड़वी,उसमें मेरा महक लगता है…

सीखना है तो सीखे,हर एक पति से पता चलेगा,
प्रिया की प्यार भरी बातें,जाने क्यों कड़क लगता है…

जब पास जाकर लिपटती हूँ,उनसे क्या कहूँ लोगों,
भूल जाते सब,उनका दिल कहता-बहक लगता है…

कितना भी चाह लूँ,जी भर के प्यार करूँ उन्हें,
मेरा हर किया वादा उन्हें क्यों,सबक लगता है…

बिताना है तुम्हें हर लम्हा,साथ मेरे ओ हमसफ़र,
साथ गुजारे पल जाने क्यों,तुम्हें सड़क लगता है…
…………………………
"ममता पाण्डेय"

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