वो

MAHESH KUMAR

रचनाकार- MAHESH KUMAR

विधा- कविता

एक मुकम्मल जहांन सा है , वो
सारी दुनियां से कुछ जुदा है ,वो

कितने दिल उसपे आज मरते हैं
जाने क्यूँ मुझ पे ही फ़िदा ,है वो

उसको इंकार करती जाऊ , मैं
कब से राहों में ही खड़ा है ,वो

मेरी हर बात जिसको ,भाती है
ऐसा अल्हड़ सा सिरफिरा है, वो।

हर घडी जिक्र मेरा करता है
यूँ ख़्यालो में गुमशुदा है , वो।

बड़ी पाकीज़ा सी मुहब्बत है
मेरे दिल में उतर रहा है, वो।

Sponsored
Views 13
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
MAHESH KUMAR
Posts 4
Total Views 35

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia