वो हो सकते इंसान नही…

डॉ संदीप विश्वकर्मा

रचनाकार- डॉ संदीप विश्वकर्मा "सुशील"

विधा- कविता

विद्ध्यालय तो बहुत है लेकिन, बचा किसी मे ग्यान नही..
पड़े लिखे सब हो गये है, पर कोई बुद्धीमान नही…

शिष्टाचार से रहना सीखो, करो बुरा व्यवहार नही..
रहते है जिवित इंसान यहाँ, ये कोई कब्रिस्तान नही…

देते लाते माँ बापो मे, करते वो सम्मान नही..
जो राम लखन सी आग्या माने, अब एसी संतान नही…

करते पूरी ख्वाहिश बच्चो की,चाहे वो हो धनवान नही..
जो श्रवण कुमार सी सेवा कर ले अब एसे इंसान नही…

दया गरीबो पर कर ले, अब एसा कोई धनवान नही..
धनवान तो है कुछ बेशक, पर वो हो सकते इंसान नही…

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