वो मेरे जर्रे जर्रे में बस्ती है

Bhupendra Rawat

रचनाकार- Bhupendra Rawat

विधा- गज़ल/गीतिका

मुझे अब हिचकी आती नही
याद उसकी मुझे सताती रही

वो मेरे जर्रे जर्रे में बस्ती है
हर एक जर्रे में दर्द समाती रही

गमज़दा है वो अब सदा के लिए
तन्हाई की आग में जलाती रही

राह तकता हूँ हर पल उसकी
मेरी रूह को भी भटकाती रही

हर पल पास आने की जुस्तजू में
उतनी ही दूर पल पल जाती रही

सारी कसमें सारे वादें वफां के कर
बेवफ़ाई के किस्से आ सुनाती रही

खिलौना समझ मेरे दिल को तोड़
दिल बहला अपना, वो जाती रही

गिरगिट की तरह रंग बदल हर बार
सर्प की तरह लिबास बदल आती रही

बदलते मौसम सा मिजाज़ बना
सितम मुझ पर ढाने आती रही

खुद चैन की नींद सोते है, रात भर
मुझे आज भी रतजगा कराती रही

चाँद की रौशनी में तारों की छाव में
उसकी यादें "भूपेंद्र" को रुलाती रही

भूपेंद्र रावत
9/08/2017

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Bhupendra Rawat
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M.a, B.ed शौकीन- लिखना, पढ़ना हर्फ़ों से खेलने की आदत हो गयी है पन्नो को जज़बातों की स्याही से रँगने की अब बगावत हो गईं है ।

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