वो मेरी हस्ती मिटाने को चला

Mahesh Kumar Kuldeep

रचनाकार- Mahesh Kumar Kuldeep "Mahi"

विधा- गज़ल/गीतिका

वो मेरी हस्ती मिटाने को चला
फूंक से पर्वत उड़ाने को चला

यूँ नहीं था ख़ास मक़सद चलने का
सिर्फ अपनी ज़िद निभाने को चला

पैरहन उजला पहनकर, देखिए
दाग़ मुझपर वो लगाने को चला

आसमां छूने की ख़्वाहिश में कहीं
वो जमीं अपनी गँवाने को चला

झूठ के साये में रहता है मगर
साँच का परचम उठाने को चला

माँगकर चिड़ियों से छोटे पंख वो
आसमां पर हक़ जताने को चला

कोई समझाए कहे 'माही' उसे
बेवज़ह झगड़े बढ़ाने को चला

माही / जयपुर

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Mahesh Kumar Kuldeep
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प्रकाशन साहित्यिक गतिविधियाँ एवं सम्मान – अनेकानेक पत्र-पत्रिकाओं में आपकी गज़ल, कवितायें आदि का प्रकाशन | प्रकाशित साहित्य - गुलदस्त ए ग़ज़ल (साझा काव्य-संग्रह), काव्य सुगंध भाग-3(साझा काव्य-संग्रह),कलाम को सलाम (साझा काव्य-संग्रह), प्रेम काव्य सागर (साझा काव्य-संग्रह), अनुकृति प्रकाशन, बरेली त्रैमासिक पत्रिका ‘अनुगुंजन’में सतत प्रकाशन |पहला गजल-संग्रह ‘कागज़ पर जिंदगी’ प्रकाशाधीन |
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2 comments
  1. शुक्रिया आदरणीया निर्मला कपिला जी |

    तहेदिल से आभार