विस्मित करता प्रभात….

शालिनी साहू

रचनाकार- शालिनी साहू

विधा- कविता

प्रभात का प्रकाश
विस्मित करता हर रोज
नयी ऊर्जा का संचार
खुल रहे हैं फिर उस
देहरी के द्वार!
जाना है हर रोज नियमित
नयी दिनचर्या से रोज
सुनहरे पलों को भूलकर
करना है अब कार्य हर रोज
बहुत बीते दिन अपनों के संग
अब जाना है उसी देहरी की ओर
जहाँ अनुभव,शब्द-ज्ञान भण्डार मिले
नयी पीढ़ी को सुन्दर,संचित आधार मिले!
नयी प्रेरणा, नव तेज, उल्लास हर रोज खिले
शब्दों की ऊर्जा से प्रभावित हर नया
मोड़ मिले!
आशीर्वाद बना रहे स्वजनों और आत्मीय
परिजनों का!
ईश्वर का हर घड़ी सहयोग मिले!
नये सिरे से उज्ज्वल हो ज्ञान मेरा
परिमार्जित, परिष्कृत हो आयाम मेरा!
गढ़ू कुंभकार की भाँति हर रोज नया पात्र
पक कर इतना तेजस्वी बने पात्र
हर छोर हर ओर रौशन हो "नाम मेरा"
.
शालिनी साहू
ऊँचाहार, रायबरेली(उ0प्र0)

Views 5
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
शालिनी साहू
Posts 47
Total Views 388

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia