विरहणी

Ankita Kulshreshtha

रचनाकार- Ankita Kulshreshtha

विधा- गज़ल/गीतिका

अक्षर अक्षर नाम तुम्हारे करती हूँ..
जब मैं इस जीवन के पन्ने भरती हूँ..
~~~~~~~~~~~~~~~
कलियां हों या हों कंटक इन राहों में…
बाधाओं से कब किंचित मैं डरती हूँ…
~~~~~~~~~~~~~~~
बीत रहे हैं पल बहती सरिता जल से…
इक पल जीती हूँ दूजे पल मरती हूँ…
~~~~~~~~~~~~~~~
छा जाते मेघा काले विस्तृत नभ पर..
बूंदों संग बनकर आंसू तब झरती हूँ…
~~~~~~~~~~~~~~
सुनती हूं कागा को बुनती हूँ सपने…
ओढ़ विरह को सजती और सँवरती हूँ…
~~~~~~~~~~~~~~
अक्षर अक्षर नाम तुम्हारे करती हूँ..
जब मैं इस जीवन के पन्ने भरती हूँ..

अंकिता

Sponsored
Views 27
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
Ankita Kulshreshtha
Posts 36
Total Views 2.8k
शिक्षा- परास्नातक ( जैव प्रौद्योगिकी ) बी टी सी, निवास स्थान- आगरा, उत्तरप्रदेश, लेखन विधा- कहानी लघुकथा गज़ल गीत गीतिका कविता मुक्तक छंद (दोहा, सोरठ, कुण्डलिया इत्यादि ) हाइकु सदोका वर्ण पिरामिड इत्यादि|

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia