वह बूढ़ी

Bikash Baruah

रचनाकार- Bikash Baruah

विधा- लघु कथा

मैं बस में बैठा था । अचानक कुछ लोग एक बूढ़ी को पकड़कर बस में चढ़ा दिया । बूढ़ी काफी गुस्से में थी । बस में ज्यादा भीड़ न थी, बूढ़ी को आसानी से बैठने के लिए जगह मिल गई। बूढ़ी ठीक मेरे पासवाले सीट पर ही बैठी हुई थी। वह काफी कमजोर लग रही थी।
उसकी उम्र भी शायद साठ-पैंसठ के आसपास
थी। बूढ़ी मन ही मन कुछ बड़बड़ा रही थी ।
मैं हरेक मिनट बाद बूढ़ी को देखता पर बूढ़ी को किसी की तरफ देखने की कोई फुर्सत
नहीं थी । वह शायद किसी से बेहद नाराज थी । बूढी की नाराजगी की वजह जानने के लिए मैं उत्सुक हो उठा । समय बीतता गया,
मेरी उत्सुकता बढ़ने लगी । अंत में मैं बूढ़ी से
वजह पूछ ही लिया । पहले बूढ़ी मुझ पर बिगड़ने लगी फिर मेरे अनुरोध पर शांत होकर मुझे सब कुछ बताया ।

वह बूढ़ी एक पेंशन प्राप्त महिला थी जिसके घर में कमानेवाला कोई नहीं और खानेवाला पांच । उस दिन सबेरे जब बैंक में पेंशन के पैसे लेने गई तो लिंक फैलर की वजह से उन्हें
पैसे नहीं मिले । बैंकवालो को हजारों मिन्नतें कर के भी कोई फायदा नहीं हुआ । बैंक से बूढ़ी का घर बहुत दूर था इसलिए वह महीने में सिर्फ एक ही बार घर से निकलती थी वो भी केवल पेंशन के पैसे के लिए । बूढ़ी के पति और एकमात्र लड़का कुछ साल पहले ही
एक दुर्घटना में चल बसे थे । अब उसके घर में बहु और तीन छोटी-छोटी पोतियाँ हैं। बहु
घर एवं लड़कियों की देखभाल में व्यस्त रहने के वजह से सास के साथ बैंक जा नहीं पाती थी । इसलिए बूढ़ी पेंशन लेने अकेली जाती,
लेकिन उस दिन जब उसे पैसे नहीं मिले तो वह आगबबूला हो उठी । पहले उसने बैंकवालों
से काफी अनुरोध किया पर जब पैसे नहीं मिले तो वह बैंकवालों को खरी-खोटी सुनाने लगी । बूढ़ी को बैंकवालें काफी देर तक समझाने की कोशिश की मगर कोई फायदा न हुआ । क्योंकि बूढ़ी को तकनीकी भाषा एवं
यंत्रके बारे में कोई ज्ञान न थी, इसलिए उसे
बैंकवालों की जुबान समझ में नहीं आ रही थी। बूढ़ी को बैंकवालें अंत में निरुपाय होकर
घर जाने की सलाह दी पर बूढ़ी अपनी जिद पर अड़ी रही । आखिर में तंग आकर बैंक के दो चपरासी मिलकर बूढ़ी को बैंक से बाहर लाकर बस में चढ़ा दिया जो मैंने खुद अपने आँखो से देखा था ।

मैं बूढ़ी की आँखो में देखने लगा । उसकी आँखे नम होने लगी थी । वह खिड़की से बाहर झांक रही थी । शायद उसकी आँखे
इस आधुनिक तथा यांत्रिक युग की हर एक चीज को अच्छी तरह देखने एवं जानने की कोशिश कर रही थी ।

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Bikash Baruah
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मैं एक अहिंदी भाषी हिंदी नवलेखक के रूप मे साहित्य साधना की कोशिश कर रहा हू और मेरी दो किताबें "प्रतिक्षा" और "किसके लिए यह कविता" प्रकाशित हो चुकी है ।

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