वतन का सिपाही

सत्य प्रकाश

रचनाकार- सत्य प्रकाश

विधा- कविता

प्रबुद्ध हो, आरूढ़ हो, हौसले मचान हैं
तू वतन का पासवा, तू वतन की शान है
डरा नहीं जो भीत से, डरा नहीं जो शीत से
प्रहरी है हिमालय सा, खड़ा अचल महान है
देश है ये सो रहा, क्योंकि जागता है तू
हमलो के तूफान का, वेग थामता है तू
फर्ज है उपासना, ये ही मानता है तू
वैरियों की गोलियों पे, सीना तानता है तू
जो हमें हैं मारते, तू उन्हे है मारता
वीरता है हमने देखी, देखी है उदारता
जिंदगी ये देश की, होम सी तू वारता
शीश का तू दान दे के, जिंदगी संवारता
प्रहरी तू है देश का, तंगहाली झेलता
मौत की तू गोद में, बिजलियो से खेलता
अपना खून दे के भी, कुछ नहीं है बोलता
संगीनो पे भी जान रख, बैरियों को ठेलता
माँ भारती के बेटे, कैसे धीर वीर हैं
वतन की आबरू बचाते, ऐसे शूरवीर है
जंग हो कि शांति हो, डिगा न उनका धीर है
फौजीयो के दम पे देखो, हिन्द का जमीर है
चैन से हम सो रहे थे , जब अपने बसेरे में
बैरियों ने उनको मारा, घात ला के डेरे में
अपनो खातिर सदा रहते, मौत के वो घेरे में
वो सितारे बन गए, सो हम जिये सवेरे में
वतन के ऐसे हाफिजो का, हाल क्यों बेहाल है
सवाल पे है रोटियां , कि रोटी पे सवाल है
सवाल ऐसे क्यू उठे, हालात पे सवाल है
मैं अफसरों से पूछता, क्यू उठ रहे सवाल है
निष्ठा पे सवाल है ये, नीयत पे सवाल है
क्या फौजी – अफसर खा रहे, दाने पे सवाल है
खाने का सवाल ये, खाने पे सवाल है
सरकार की दलीलों पे, बहाने पे सवाल है
खाना है खराब क्यू, जनता को हिसाब दो
वो पिस रहे गुलाम से, अफसरों जवाब दो
उठ रही जो उंगलियां, जवाब हैं तलाशती
ओ लीडरों जवाब दो, ओ अफसरों जवाब दो
जय हिंद जय भारत, जय जवान जय किसान

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सत्य प्रकाश
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