आतंकवादियों की देश के अंदर से सहायता वाले आस्तीन के सापों के लिए एक रचना

saurabh surendra

रचनाकार- saurabh surendra

विधा- गज़ल/गीतिका

देखकर हमारी शहादत जिसको खुशी मिलती है
है अपना मगर शक्ल पड़ोसी से उसकी मिलती है

ऐसा भी नही की मालूम न हो ठिकाना उसका
पर सियासत के दिल में वोटों की बेबसी मिलती है

अजब रिवायत है इस शहर की ,वफाओं को भूख
और धोखों को बिरयानी से भरी कटोरी मिलती है

वतन से मुहब्बत ही हमें खामोश नहीं रहने देती
वरना चुप रहने की हिदायत तो हमें भी मिलती है

वतनपरस्ती का तो ये आलम है यहाँ पर सौरभ
जुबां पे तो मिलती है ,पर रगों में नहीं मिलती है

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saurabh surendra
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