लोकतंत्र की अवाम

संजय सिंह

रचनाकार- संजय सिंह "सलिल"

विधा- गज़ल/गीतिका

यूं हक लोकतंत्र का अता होता ही रहा l
रोशनी मिलती रही घर जलता ही रहा ll

जड़ों में थी दीमक हवा में धुंआ भी l
ऐसे पौधे को लहू से सीचता ही रहा ll

सागर की कुछ मछलियां सागर ही पी गईl
साथ पतवार फिर भी किनारे ही रहाll

वह अब भी करता है दावा रहनुमा होने काl
जो कुबेर की राजधानी में भटकता ही रहा ll

देश की अवाम "सलिल" बकरा हलाल का l
कोई न कोई गर्दन पर छुरी चलाता ही रहा ll

संजय सिंह "सलिल "
प्रतापगढ़ ,उत्तर प्रदेश ll

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संजय सिंह
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मैं ,स्थान प्रतापगढ़ उत्तर प्रदेश मे, सिविल इंजीनियर हूं, लिखना मेरा शौक है l गजल,दोहा,सोरठा, कुंडलिया, कविता, मुक्तक इत्यादि विधा मे रचनाएं लिख रहा हूं l सितंबर 2016 से सोशल मीडिया पर हूं I मंच पर काव्य पाठ तथा मंच संचालन का शौक है l email-- sanjay6966@gmail.com, whatsapp +917800366532

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