लैपटॉप

Abha Saxena

रचनाकार- Abha Saxena

विधा- लघु कथा

लघु कथा
लैप टाॅप
सोने की बहुत कोशिश कर रही थी पर नींद आ ही नहीं आ रही थी मालूम नहीं किस कोने में छिप कर बैठ गयी है मेरी नींद। नमन मेरे पति काफी देर पहले ही सो गये थे। समझ नहीं आ रहा था क्या करूं पत्रिकाओं को भी उलट पलट कर देख लिया था। आज कल पत्रिकायें भी कमाने का धन्धा बन गयीं हैं। पढ़ने की चीजें कम फालतू के विज्ञापन ज्यादा होते हैं।
लैप टाॅप उठाया देखूं फेसबुक पर या फिर स्काई पी पर ही कोई मिल जाये गप्पें ही लगाने को मिल जायेंगी। मैंने जैसे ही स्काई पी लगाया तो देखा सिद्धार्थ मेरा बेटा आॅन लाइन ही था।
मैंने उसे अपने स्काई पी पर कनैक्ट कर ही लिया मुझे देखते ही बोला ‘‘हैलो मम्मी क्या हो रहा है सुना है देहरादून में बहुत ठंड हो रही है। कैसे चल रहा है वहाँ? पापा कैसे हैं वह तो सो गये होगे आप नहीं सोयीं अभी तक रात के ग्यारह बज रहे हैं।’’
हाँ बेटा आजकल नींद ही नहीं आती है। ऐसे ही करवट बदलती रहती हूं सुबह के समय आती भी है तब तक उठने का टाइम हो जाता है। और तू बता वहाँ कनाडा में मौसम कैसा है? वहाँ भी तो ठंड बहुत पड़ रही है। शून्य में चला जाता होगा वहाँ का तापमान ’’
‘‘हाँ मम्मी माइनस थर्टी चल रहा है आजकल तो पर, यहाँ कोई परेशानी नहीं होती हर जगह तो हीटर लगे होते हैं यहाँ के घर, सारे आॅफिस सेन्ट्रली हीटिंग सिस्टम पर काम करते है। यहाँ तक कि बच्चों के स्कूल भी। मम्मी आप की आँखें क्यों सूज रहीं हैं रोयी हैं क्या आप?’’
यह कह कर उसने रीना और बेटी चिंकी को भी बुला लिया था स्काई पी पर……..।
‘‘गुड मोर्निंग मम्मी कैसी है? आप बहुत कमजोर लग रहीं हैं क्या हुआ तबियत तो ठीक है?’’ यह बहू रीना की आवाज थी
मैंने बात को घुमाना चाहा ‘‘मैं ठीक हूं तुम कैसी हो? चिंकी तो अब स्कूल जाने लगी होगी?’’
‘‘ हाँ मम्मी अब वह स्कूल जाने लगी है’’
मैंने ही पूछा ‘‘ यह बताओ तुम लोग कब आ रहे हो इंडिया तुमसे मिलने का अब बहुत मन करता है’’
मुझे लग रहा था कि मेरा पूरा परिवार ही मेरे बिस्तर पर ही आ कर बैठ गया है।
बहू बेटा और मेरी लाडली पोती। आज कल टैक्नोलोजी कितनी प्रगति कर गयी है सब हुछ सैकिन्ड के अन्दर हाथ में ही मिल जाता है।
‘‘माँ हम लोग मन बना तो रहे हैं इन्डिया आने का पर कब तक पहुच पायेंगे यह निश्चित नहीं है।’’
‘‘ फिर भी कितना ?’’
‘‘शायद छः महीने तो लग ही जायेंगे’’
मैंने गहरी साँस ली और बोला‘‘छः महीने ………अभी तो बहुत लम्बा टाइम है फिर तो’’
‘‘क्यों मम्मी क्या हुआ? मैं आरहा हूं ना आप लोगों के पास। फिर आप क्यों चिन्ता कर रही हैं’’
‘‘ अच्छा बेटा अब बहुत जोरों से नींद आने लगी है अब सोती हूं’’ और मैंने इन्टरनेट कनैक्शन काट दिया था आँखों से आँसू बहने लगे थे मैंने लैप टाॅप को अपने सीने से लगा लिया था। लग रहा था जैसे मैंने पूरे परिवार को ही सीने से लगा लिया है।
बेटा तब तक तो बहुत देर हो जायेगी कैन्सर अपनी आखिरी स्टेज पर पहुंच चुका है
मन ही मन बुदबुदा रही थी मैं, लग रहा था मैंने अपना दुख अपने बेटे तक पहुचा दिया हैं
आभा

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Abha Saxena
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2 comments
  1. वाह्ह्ह्ह आभा जी बहुत बढिया लघु कथा1