लाल बिंदी …

NIRA Rani

रचनाकार- NIRA Rani

विधा- कविता

माथे पर मॉ लाल बिंदी लगाती थी
बस उसी से मॉ समर्पित दिखलाती थी
बिंदी के श्रंगार से उसका चेहरा झिलमिलाता था
बिन मेकअप के लालिमा जगाता था
मॉ के लिए बिंदी एक सम्मान थी
उसके नारीत्व का सम्मान थी
स्त्रीत्व की पहचान थी
पति के प्रति समर्पण की पहचान थी
बिंदी लगाकर मॉ ओज से लहकती थी
और आज की नारी को बिंदी न लगाने पर डपटती थी .
पर आज मॉ के माथे पर बिंदी नही है
क्यूकि पापा का हाथ उसके हाथो में नही है
आज वो एकदम उदास नजर आती है
चेहरे से वो गमगीन नजर आती है ..
एक बिंदी जब उसके माथे पे सजी थी
बेपनाह मुहब्बत के रिश्ते मे बंधी थी
पर आज न वो बिंदी है न ही उनका साथ है
भाव विह्वल उनकी ऑखे है
और सूने माथे का साथ ……

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NIRA Rani
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साधारण सी ग्रहणी हूं ..इलाहाबाद युनिवर्सिटी से अंग्रेजी मे स्नातक हूं .बस भावनाओ मे भीगे लभ्जो को अल्फाज देने की कोशिश करती हूं ...साहित्यिक परिचय बस इतना की हिन्दी पसंद है..हिन्दी कविता एवं लेख लिखने का प्रयास करती हूं..

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