ललकार

dr. pratibha prakash

रचनाकार- dr. pratibha prakash

विधा- गीत

आर्यावर्त सप्त सैन्धव सिंहजीत भारत कहलाया है
इसकी पावन माटी को माता कहकर बुलाया है
चरण पखारे लहराता सागर, हिमालय ने मुकुट सजाया है
पश्छिम में भू स्वर्ण कच्छ की, पूरब में गंग की अंतिम धारा है
इसकी पावन माटी……………………………………….
शक हूँण और यूनानियों ने इसका गौरव ही गाया हा
भले लूटने म्लेच्छ भी आये अंग्रेजों ने भी शीश झुकाया है
इसकी पावन माटी ……………………………………….
अखण्ड संस्कृति खण्ड सभ्यता अतुल्य श्रंगार सजाया है
शस्य श्यामला इस माटी को असंख्य वीरों को जाया है
इसकी पावन माटी……………………………………
विश्व गुरु हम शांति प्रणेता किन्तु शस्त्रों को भी उठाया है
बन रणचंडी औ हलाहल शिव का पिया गरल का प्याला है
इसकी पावन माटी ………………………………………..
देते चेतावनी अंतिम तुमको मात सहनशीलता आजमाओ
हम रना शिवा अशोक के वंशज भय को हमने हराया है
इस पावन माटी …………………………………………..
भूल जाओ केसर घटी को क्यों आतंक मचाया है
कायर नहीं हिंदुस्तान हर युद्ध में तुमको हराया है
इस पावन माटी ………………………………………..
आर्यावर्त सप्त सैन्धव …………………………………….
डा प्रतिभा प्रकाश

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dr. pratibha prakash
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Dr.pratibha d/ sri vedprakash D.o.b.8june 1977,aliganj,etah,u.p. M.A.geo.Socio. Ph.d. geography.पिता से काव्य रूचि विरासत में प्राप्त हुई ,बाद में हिन्दी प्रेम संस्कृति से लगाव समाजिक विकृतियों आधुनिक अंधानुकरण ने साहित्य की और प्रेरित किया ।उस सर्वोच्च शक्ति जसे ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु गॉड कहा गया है की कृपा से आध्यात्मिक शिक्षा के प्रशिक्षण केंद्र में प्राप्त ज्ञान सत्य और स्वयं को आपके समक्ष प्रस्तुत कर रही हूँ।

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