लफ़्ज़ो में न दफ्नाओ

राजेश

रचनाकार- राजेश"ललित" शर्मा

विधा- अन्य

दो क्षणिकायें अलग अलग संदर्भों में प्रस्तुत हैं आशा है पसंद आयेंगी।
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लफ़्ज़ों में न दफ्नाओ
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लफ़्ज़ों में
न दफ्नाओ
मेरे जज़्बातों को
कहना है अभी
बहुत कुछ उनको
धीरे धीरे
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राजेश"ललित"शर्मा
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कश्ती ही तो है
डुबो देगी
या छोड़ देगी साहिल पर
हमने तो तूफ़ान देख कर
उतारी है कश्ती मँझधारे में
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राजेश"ललित"शर्मा

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राजेश
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मैंने हिंदी को अपनी माँ की वजह से अपनाया,वह हिंदी अध्यापिका थीं।हिंदी साहित्य के प्रति उनकी रुचि ने मुझे प्रेरणा दी।मैंने लगभग सभी विश्व के और भारत के मूर्धन्य साहित्यकारों को पढ़ा और अचानक ही एक दिन भाव उमड़े और कच्ची उम्र की कविता निकली।वह सिलसिला आज तक अनवरत चल रहा है।कुछ समय के लिये थोड़ा धीमा हुआ पर रुका नहीं।अब सक्रिय हूँ ,नियमित रुप से लिख रहा हूँ।जब तक मन में भाव नहीं उमड़ते और मथे नहीं जाते तब तक मैं उन्हें शब्द नहीं दे पाता। लेखन :- राजेश"ललित"शर्मा रचनाधर्म:-पाँचजन्य में प्रकाशित "लाशों के ढेर पर"।"माटी की महक" काव्य संग्रह में प्रकाशित।

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