“लड़ता हूँ”

Prashant Sharma

रचनाकार- Prashant Sharma

विधा- गज़ल/गीतिका

अब लड़ता नहीं यार जीतने के लिए।
लङता हूं बस दिल बहलाने के लिए।

जीत जीत कर थक चुका हूं मेरे हमदम।
अब लड़ता हूं बस तुझे जिताने के लिए।

हर मंजिल की जीत करती रही एक नया प्रश्न।
तो अब लड़ता हूँ मन समझाने के लिए।

दुनिया के सारे गम मुझे अपने ही लगे।
सो लड़ता रहूंगा बस इस जमाने के लिये।

दुनिया में ना मिला कोई अपना हमसफर मुझे।
अब लड़ता हूं तेरे दिल मे आशियाने के लिए।

प्रशांत शर्मा "सरल"
नरसिंहपुर

Views 4
इस पेज का लिंक-
Recommended
Author
Prashant Sharma
Posts 28
Total Views 1.1k

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia