लखनऊ

निहारिका सिंह

रचनाकार- निहारिका सिंह

विधा- अन्य

विकास में तत्पर लेकिन ,
अपने संस्कारों में रमा है लखनऊ ।
पुराने रीति रिवाजों वाला लेकिन
अब तक जवां है लखनऊ ।
जो महसूस करते हैं ज़िन्दगी की थकान खुद में
उनके लिए बेजोड़ दावा है लखनऊ ।
अन्जान शहर अंजान ही रहते हैं
आकर देखें अपना अपना-सा है लखनऊ ।
अदब और तहज़ीब की अपनी पहचान लिए
औरों से बिल्कुल जुदा- जुदा है लखनऊ ।
रूठे को मना ले , गम को भी खुशी कर दे
ऐसी आब-ओ-हवा है लखनऊ ।
मुस्कुराइये कि आप लखनऊ में हैं
ऐसा गुलिस्तां है लखनऊ ।
दिल बस जाए आपका यहीं पर
खुद में ऐसी अदा है लखनऊ ।
आकर तो देखो एक बार लखनऊ में
कह न उठो "वाह्ह , क्या खुदा है लखनऊ " ।

निहारिका सिंह

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निहारिका सिंह
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स्नातक -लखनऊ विश्वविद्यालय(हिन्दी,समाजशास्त्र,अंग्रेजी )बी.के.टी., लखनऊ ,226202।

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