रोज़ लिखती हूँ

Ananya Shree

रचनाकार- Ananya Shree

विधा- कविता

रोज लिखती हूँ नए छंद नई रुबाई
मन के उद्गार और भीगी हुई तन्हाई
हूँ कलमकार डुबोती हूँ जब भी खुद को
भाव लेती हूँ वही होती जहाँ गहराई!!
राख के ढेर से उठता नहीं देखा है धुँआ
पाट बैठी हूँ दग़ाबाज़ हसरतों का कुँआ
फिर भी छू जाती मुझे यादों की वो पुरवाई
भाव लेती हूँ वही होती जहाँ गहराई!
रोज लिखती हूँ नए छंद नई रुबाई!!
अनन्या "श्री"

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Ananya Shree
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प्रधान सम्पादिका "नारी तू कल्याणी हिंदी राष्ट्रीय मासिक पत्रिका"

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