रेल से अजब निराली है

शिवदत्त श्रोत्रिय

रचनाकार- शिवदत्त श्रोत्रिय

विधा- कविता

रेल से अजब निराली है
इस काया की रेल – रेल से अजब निराली है|
ज्ञान, धरम के पहिए लागे,
कर्म का इंजन लगा है आंगे,
पाप-पुण्य की दिशा मे भागे,
२४ घड़ी ये खुद है जागे,
शुरु हुआ है सफ़र अभी ये गाड़ी खाली है||
इस काया की रेल …………

एक राह है रेल ने जाना
जिसको सबने जीवन माना
हर स्टेशन खड़ी ट्रेन है
अंदर आओ जिसको है जाना
झंडी हरी मिली रेल अब जाने वाली है||
इस काया की रेल …………

जिसको भी मंज़िल पहुचाया
उससे पुण्य का भाड़ा पाया
पाप की गठरी खूब कमाया
जिस पथिक को मार्ग गुमाया
मद योवन मे डूबी रेल ये रेल मतवाली है||
इस काया की रेल …………

पाप पुण्य का हिसाब मगाया
यॅम का आज निमंत्रण आया
गार्ड ने लाल झंडी दिखाया
आख़िरी स्टेशन बतलाया
अब कितना भी करलो जतन रेल नही चलने वाली है||
इस काया की रेल …………

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शिवदत्त श्रोत्रिय
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हिन्दी साहित्य के प्रति रुझान, अपने विचारो की अभिव्यक्ति आप सब को समर्पित करता हूँ| ‎स्नातकोत्तर की उपाधि मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय प्रोद्योगिकी संस्थान से प्राप्त की और वर्तमान समय मे सॉफ्टवेर इंजिनियर के पद पर मल्टी नॅशनल कंपनी मे कार्यरत हूँ|| दूरभाष क्रमांक:- 9158680098 ईमेल :- shivshrotriya91@gmail.com
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