” रेगिस्तान “

पूनम झा

रचनाकार- पूनम झा

विधा- लघु कथा

" सबके गहने और साड़ियाँ फीकी पर जाती है किटी में रोमा के सामने "—-रितु ने कहा । सभी ने एक साथ हामी भरी ।
आखिर होता भी क्यों नहीं उसके गहने और साड़ियाँ होती भी लाजवाब है ।
रितु — " रोमा तुम्हारे पतिदेव तुमसे सचमुच बहुत प्यार करते हैं जो इतनी महंगी-महंगी साड़ियाँ और गहने दिलाते रहते हैं । कुछ तो हमें भी सिखा दो जिससे हमारे पति भी हमें ऐसे ही प्यार करें । "…….
" छोड़ो भी , मेरा मजाक मत बनाओ "—कहते हुए रोमा खिलखिलाकर हँस दी ।
सभी तम्बोला में व्यस्त हो गए और रोमा अपने अतीत में खो गई । पहली रात ही रवि ने कह दिया था –" देखो मैं किसी और के साथ प्रेम करता हूँ । तुम्हें प्यार के सिवा सबकुछ दुंगा , तुम्हें मंजूर है तो ठीक नहीं तो तुम आजाद हो अपना निर्णय लेने के लिए। "…… रोमा सुन्न हो गई थी । मगर कहती कैसे अपने गरीब माता पिता को । बड़ी मुश्किल से इतना अच्छा रिश्ता मिला था उनकी बेटी के लिए । ऐसी बातें सुनकर वे सदमा कैसे झेलेंगे ? यही सोचकर रोमा ने चुप्पी साध ली और 11 साल से गृहस्थी की उस रेगिस्तान में बस अकेले चलती आ रही है । पर रवि भी वचन का पक्का निकला । प्रेम के सिवा सबकुछ दिया यहाँ तक कि हमें माँ का सुख भी ।
तभी रवि का फोन आया — " रोमा आज मैं रात को घर नहीं आ पाऊंगा । शालिनी के घर रुकूंगा , बच्चों को अपने तरीके से समझा देना । "…….रोमा ने एक सीधा सपाट जवाब दिया –" जी " — और फिर तम्बोला में व्यस्त सभी सहेलियों की फीकी साड़ियों से प्रेम के गहरे रंग की जो आभा नजर आ रही थी उसे अपलक देखने लगी ।
–पूनम झा
कोटा राजस्थान

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पूनम झा
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मैं पूनम झा कोटा,राजस्थान (जन्मस्थान: मधुबनी,बिहार) से । सामने दिखती हुई सच्चाई के प्रति मेरे मन में जो भाव आते हैं उसे शब्दों में पिरोती हूँ और यही शब्दों की माला रचना के कई रूपों में उभर कर आती है। मैं ब्लॉग भी लिखती हूँ | इसका श्रेय मेरी प्यारी बेटी को जाता है । उसी ने मुझे ब्लॉग लिखने को उत्प्रेरित किया। कभी कभी पत्रिकाओं में मेरी रचना प्रकाशित होती रहती है | ब्लॉग- mannkibhasha.blogspot.com

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