रुलाती है बेटियां

स्वाति सोनी 'मानसी'

रचनाकार- स्वाति सोनी 'मानसी'

विधा- कविता

पीहर कभी ससुराल सजाती है बेटियां ।
दोनों कुलों का मान बढ़ाती है बेटियां ।

होती है बिदाई तो रुलाती है बेटियां ।
बाबुल का अरमान सजाती है बेटियां ।

इनके बिना अधूरी हर घर में रौशनी
चराग अंधेरों में जलाती है बेटियां ।

मत जुल्म करों दान की सूली पे चढ़ाओ,
हर वंश की बेला को बढ़ाती है बेटियां

बन कल्पना लक्ष्मी सुधा वसुंधरा ममता,
हो जिस रूप में दुनिया को बनाती है बेटियां ।

अहिल्या बनी सीता बनी द्रौपदी उर्मिला,
हर किरदार तहेदिल से निभाती है बेटियां ।

ये फूल जहां में यूँही खिलता रहे सदा,
दुआ बनके फरिश्तों की आती है बेटियां ।

स्वाति सोनी 'मानसी'

Views 69
Sponsored
Author
इस पेज का लिंक-

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


Sponsored
Related Posts
हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia