रिश्तों की वह डोर

RAMESH SHARMA

रचनाकार- RAMESH SHARMA

विधा- दोहे

मैने खुद ही तोड दी,.रिश्तों की वह डोर!
लगी स्वार्थ वश जो मुझे,क्षीण और कमजोर!

निर्बल दुर्बल हो रहे,ताकतवर बलवान !
लोकतंत्र की देश मे,यह कैसी पहचान! !

अँधा हो कानून जँह, बहरी हो सरकार!
निर्बल की सुनता नही,कोई वहाँ पुकार! !
रमेश शर्मा.

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RAMESH SHARMA
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अपने जीवन काल में, करो काम ये नेक ! जन्मदिवस पर स्वयं के,वृक्ष लगाओ एक !! रमेश शर्मा

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