रिश्ते

Shubha Mehta

रचनाकार- Shubha Mehta

विधा- कविता

बडे़ अजीब होते हैं रिश्ते
कुछ बने बनाए मिलते हैं
तो कुछ बन जाते हैं
और कुछ बनाए जाते हैं
स्वार्थ पूर्ती के लिए
कैसे भी हों,आखिर रिश्ते तो रिश्ते हैं
बडे नाजुक से……
सम्हालना पडता है इन्हे
बडे जतन से
लगाना पडता है
"हेंडल विद केयर"का लेबल
वरन टूट कर बिखरने का डर
और चटक गये तो ….
ताउम्र सहनी पडती है
कसक घाव की
कोई मरहम काम नही आता
शायद समय के साथ गहराई
कम हो जाती है
पर,छोड जाती है निशाँ
. देख कर जिन्हें
टीस सी उठती है
करनी पडती है भरसक कोशिश
छिपाने की इन्हे
बडे़ अजीब होते हैं………ये रिश्ते।

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Shubha Mehta
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3 comments
  1. ये रिश्तें काँच से नाजुक जरा सी चोट पर टूटे
    बिना रिश्तों के क्या जीवन ,रिश्तों को संभालों तुम
    हर कोई मिला करता बिछड़ने को ही जीबन में
    मिले, जीबन के सफ़र में जो उन्हें अपना बना लो तुम

    बहुत खूब , शब्दों की जीवंत भावनाएं… सुन्दर चित्रांकन