“राम” को बक्स दो

पं.संजीव शुक्ल

रचनाकार- पं.संजीव शुक्ल "सचिन"

विधा- कुण्डलिया

*****राम को बक्स दो*******
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किसको दिया था नाम राम भी सोचते होंगे,
देख दशा स्व नाम की अश्रु पोछते होंगे
पोछते होंगे आखों से वो बहती धारा
सोचते होंगे आज मैं कैसा बना बेचारा
कहै "सचिन" कविराय राम का दरश हो जिसको
पुछना तुम एकबार नाम ये दिया था किसको??
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धर्म धरातल में धसा गुरु बने धनवान
नाम बलकर राम का हुये प्रचंड बलवान,
हुये प्रचंड बलवान जोड़ ली पाप से नाता
किये पाप दर पाप खोल ली नर्क में खाता।
"सचिन" खुला जो खाता इनके बीगड़े सारे कर्म
पाया ऐसा धर्माधिष आज कलंकित धर्म।।
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धसता रहा धरातल में हर दिन हर पल धर्म
नाम बेचकर राम का करता रहा कुकर्म,
करता रहा कुकर्म तनिक भी समझ न आई
बुरे काम का बुरा नतीजा सुन ले भाई।
कहै "सचिन" कविराय हृदय तेरे पाप न रहता
कुल कलंक ना बनता नाहीं गर्क में धसता।
©®पं.संजीव शुक्ल "सचिन"
30/8/2017

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मैं पश्चिमी चम्पारण से हूँ, ग्राम+पो.-मुसहरवा (बिहार) वर्तमान समय में दिल्ली में एक प्राईवेट सेक्टर में कार्यरत हूँ। लेखन कला मेरा जूनून है।

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