रमेशराज की पद जैसी शैली में तेवरियाँ

कवि रमेशराज

रचनाकार- कवि रमेशराज

विधा- तेवरी

रमेशराज की पद जैसी शैली में तेवरी….1.
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कैसे भये डिजीटल ऊधौ
पहले थे हम सोने जैसे, अब हैं पीतल ऊधौ |
अब हर बात तुम्हारी लगती
है छल ही छल , है छल ही छल , है छल ही छल ऊधौ |
कहकर अच्छे दिन आयेंगे
पाँव पाँव में डाल रहे हो सबके साँकल ऊधौ |
पी ली हमने कड़वी औषधि
रोग हमें क्यों घेर रहे फिर बोलो पल पल ऊधौ |
+रमेशराज

रमेशराज की पद जैसी शैली में तेवरी….2.
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देखी कवि तेरी कविताई
शब्दों के भीतर ज़हरीली तूने फसल उगाई |
कवि ये तूने क्या कर डाला
जहाँ बनाना था पुल तुझको , वहाँ बनाई खाई |
बोलो क्या कवि-कर्म यही है ?
जहाँ प्यार के स्वर मीठे थे आग वहाँ धधकाई |
कवि तू करने चला उजाला !
घुप्प अँधेरे में फिर तूने क्यों कंदील बुझाई |
कवि तू खुद को कहे कबीरा !
सम्प्रदाय की रार तुझे फिर क्यूंकर पल-पल भायी ?
+रमेशराज

रमेशराज की पद जैसी शैली में तेवरी….3.
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नेता डोलें फूले-फूले
जिस जनता ने वोट दिया था , उस जनता को भूले |
अब तक जितने गद्दी बैठे
कोरे आश्वासन वाले सब लम्पट घाघ बतूले |
जनता अपना हक़ जो माँगे
जनता के प्रतिनिधि बनकर ये होते आग-बबूले |
अपने जो पुरखों ने सींची
उन डालों पर आज विदेशी डाल रहे हैं झूले |
अच्छे दिन कैसे ये आये
सपने अपने हुए अपाहिज अंधे लगड़े लूले |
+रमेशराज

रमेशराज की पद जैसी शैली में तेवरी….4.
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ऊधौ दिन अच्छे ये कैसे !
डीज़ल और खाद के हर दिन जब तुम दाम बढाऔ |
मत तुम थोथे गाल बजाऔ
क्यों न मिली इस महंगाई से हमको मुक्ति बताऔ ?
ऊधौ नित इज्ज़त पर डाके
बहिन-बेटियाँ रहें सुरक्षित वो क़ानून बनाऔ |
ऊधौ तुम तो रहे स्वदेशी
गीत विदेशी फिर किस कारण भारत-बीच सुनाऔ ?
पहले अंग्रेजों ने लूटे
पुनः विदेशी हमको लूटें , जाल न नये बिछाऔ |
+ रमेशराज

रमेशराज की पद जैसी शैली में तेवरी….5.
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ठगिनी आज सियासत देखी
हर नेता के भीतर हमने छल की आदत देखी |
इसका गिरना तय है यारो !
सरकारी ठेके पर हमने खड़ी इमारत देखी |
पल-पल पापों का अभिनन्दन
हिस्से में अब सच्चाई के केवल जिल्लत देखी |
जो नित माँ-बहिनों को लूटे
अबला उन गुंडों के आगे करती मिन्नत देखी |
धर्म का विकृत रूप कबीरा
वैरागी की धन-नारी से विकट मुहब्बत देखी |
+रमेशराज

रमेशराज की पद जैसी शैली में तेवरी….6.
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ऊधौ खल ही तुमने तारे
कुर्सी-कुर्सी पर बैठाए चोर और हत्यारे |
ऊधौ दीखें बिल्डिंग – सड़कें
नये-नये कानून बनाकर छीने खेत हमारे |
ऊधौ जन को दाल न रोटी
मन के भीतर अब भरती नित मंहगाई अंगारे |
ऊधौ हमको तुम छल बैठे
लगा-लगाकर नव विकास के मंच-मंच से नारे |
ऊधौ आम आदमी सिसके
खास जनों की सुविधा के हित सब कानून तुम्हारे |
+रमेशराज

रमेशराज की पद जैसी शैली में तेवरी….7.
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ऊधौ जय-जयकार तुम्हारी
पाँच साल के बाद तुम्हें फिर आयी याद हमारी |
ऊधौ अब इज्ज़त पर डाके
बहिन-बेटियाँ लूट रहे हैं अब जल्लाद हमारी |
ऊधौ बिगड़े बजट घरों के
महंगाई से आज तबीयत अति नाशाद हमारी |
ऊधौ इसको धर्म कहो मत
आगजनी – पथराव करे बस्ती बर्बाद हमारी |
ऊधौ कैसे वोट तुम्हें दें
मत आंको तुम जाति-धर्म से अब तादाद हमारी |
+ रमेशराज

रमेशराज की पद जैसी शैली में तेवरी….8.
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मैया मेरी कैसी ये आज़ादी ?
खुलेआम अब लूट रही है जनता को नित खादी |
मैया मेरी कैसौ देश हमारौ
अब बाबू चपरासी तक हैं सब रिश्वत के आदी |
मैया मेरी सम्प्रदाय के झगड़े
हर बस्ती को फूँक रहे हैं मज़हब के उन्मादी |
मैया मेरी होय 'रेप ' थाने में
रपट लिखने कित जाये अब हर अबला फरियादी |
मैया मेरी पूँजीवाद निगोड़ा
मिल नेता सँग शोषण करता बनकर अब जल्लादी |
+ रमेशराज
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+रमेशराज, 15/109, ईसानगर , अलीगढ़-202001
Mo.-9634551630

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कवि रमेशराज
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परिचय : कवि रमेशराज —————————————————— पूरा नाम-रमेशचन्द्र गुप्त, पिता- लोककवि रामचरन गुप्त, जन्म-15 मार्च 1954, गांव-एसी, जनपद-अलीगढ़,शिक्षा-एम.ए. हिन्दी, एम.ए. भूगोल सम्पादन-तेवरीपक्ष [त्रैमा. ]सम्पादित कृतियां1.अभी जुबां कटी नहीं [ तेवरी-संग्रह ] 2. कबीर जि़न्दा है [ तेवरी-संग्रह]3. इतिहास घायल है [ तेवरी-संग्रह एवम् 20 स्वरचित कृतियाँ | सम्पर्क-9634551630

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