ये जीवन भी क्या हैं?

Neeraj Chauhan

रचनाकार- Neeraj Chauhan

विधा- मुक्तक

ये जीवन भी क्या हैं, कभी उत्थान तो कभी पतन,
कभी गूँज भरी किलकारियाँ, कभी मौत का निमंत्रण
कही लुटता हुआ धन हैं, कही घुटता हुआ मन,
कही हंसने पर पैसा हैं, कही रोना आजीवन !

– नीरज चौहान

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Neeraj Chauhan
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कॉर्पोरेट और हिंदी की जगज़ाहिर लड़ाई में एक छुपा हुआ लेखक हूँ। माँ हिंदी के प्रति मेरी गहरी निष्ठा हैं। जिसे आजीवन मैं निभाना चाहता हूँ।

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5 comments
    • पूज्या , आपकी ये ‘वाह्ह’ मेरे लिए बहुत कीमती साबित होगी।
      आपका बहुत आभार।

  1. सुन्दर प्रस्तुति बहुत ही अच्छा लिखा आपने

    ये जीबन यार ऐसा ही ,ये दुनियाँ यार ऐसी ही
    संभालों यार कितना भी आखिर छूट जाना है

    सभी बेचैन रहतें हैं ,क्यों मीठी बात सुनने को
    सच्ची बात कहने पर फ़ौरन रूठ जाना है

    समय के साथ बहने का मजा कुछ और है प्यारे
    बरना, रिश्तें काँच से नाजुक इनको टूट जाना है

    रखोगे हौसला प्यारे तो हर मुश्किल भी आसां है
    अच्छा भी समय गुजरा बुरा भी फूट जाना है

    ये जीबन यार ऐसा ही ,ये दुनियाँ यार ऐसी ही
    संभालों यार कितना भी आखिर छूट जाना है