ये कैसी देश की झाँकी है

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लक्ष्मी सिंह

रचनाकार- लक्ष्मी सिंह

विधा- कविता

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ये कैसी देश की झाँकी है,
बदलाव अभी भी बाँकी है ।
कुछ करके दिखलानी है,
सम्पूर्ण आजादी लानी है ।
🌹💕🌹💕🌹
पथभ्रष्ट हो गए हैं नेता,
जो देश को लूट के है खाता ।
जो खुद दंगा फैलाता है,
और बाद में मलहम लगता है ।
ये कैसी, गंदी राजनीति है,
जो देश का खून पीती है
ये कैसी देश की झाँकी है,
बदलाव अभी भी बाँकी है ।
कुछ करके दिखलानी है,
सम्पूर्ण आजादी लानी है ।
🌹💕🌹💕🌹
बिन माँ का बच्चा रोता है,
माता पिता बस बोझा है ।
औरत की अस्मत बिकती है,
इन्सान की किमत सस्ती है ।
रिश्ता पैसों से बनती है,
ये कैसी सभ्यता संस्कृति है ।
ये कैसी देश की झाँकी है,
बदलाव अभी भी बाँकी है ।
कुछ करके दिखलानी है,
सम्पूर्ण आजादी लानी है ।
🌹💕🌹💕🌹
गंगा मैली रोती है,
हवा बहुत प्रदुषित है ।
फैली हुई महामारी है,
भ्रष्टाचार और लाचारी है ।
नारी की इज्जत लुटती है,
प्रकृति फूट के रोती है ।
ये कैसी देश की झाँकी है,
बदलाव अभी भी बाँकी है ।
कुछ करके दिखलानी है,
सम्पूर्ण आजादी लानी है ।
🌹💕🌹💕🌹
निर्दोष शूली पर चढ़ता है,
अपराधी निर्भय हो घूमता है ।
कोट – कचहरी लम्बी चक्की है,
कानून के आँखों पर पट्टी है ।
न्याय जल्दी नहीं मिलती है,
येकैसी संविधान की नीति है ।
ये कैसी देश की झाँकी है,
बदलाव अभी भी बाँकी है ।
कुछ करके दिखलानी है,
सम्पूर्ण आजादी लानी है ।
🌹💕🌹💕🌹
माना चाँद पर पहुँच गई बेटी,
फिर भी गर्भ में है मरती ।
दहेज की भट्ठी में जलती,
भेद-भाव का दंश सहती ।
जिस देश में नारी पूजी जाती है,
वहीं नारी की क्यों ऐसी स्थिति है ।
ये कैसी देश की झाँकी है,
बदलाव अभी भी बाँकी है ।
कुछ करके दिखलानी है,
सम्पूर्ण आजादी लानी है ।
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क्या इसी दिन के लिए,
फाँसी पर चढ़े स्वतंत्रता सेनानी ।
कितनों ने दे दी अपनी कुर्बानी ।
क्या ऐसी ही भारत का सपना
देखें थें नेहरू और गाँधी जी ।
एक बार तो सोचो देशवासी,
होगी तुम्हें ग्लानी…… ।
ये कैसी देश की झाँकी है,
बदलाव अभी भी बाँकी है ।
कुछ करके दिखलानी है,
सम्पूर्ण आजादी लानी है ।
🌹💕🌹🌹
—लक्ष्मी सिंह 🌹

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लक्ष्मी सिंह
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