ये कैसी देश की झाँकी है

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लक्ष्मी सिंह

रचनाकार- लक्ष्मी सिंह

विधा- कविता

ये कैसी देश की झाँकी है,
बदलाव अभी भी बाकी है ।
कुछ करके दिखलाना है,
सम्पूर्ण आजादी लाना है ।

पथभ्रष्ट हो गए हैं नेता,
जो देश को लूट के है खाता।
जो खुद दंगा फैलाता है,
और बाद में मलहम लगाता है।
ये कैसी,गंदी राजनीति है,
जो देश का खून पीती है
ये कैसी देश की झाँकी है,
बदलाव अभी भी बाकी है ।
कुछ करके दिखलाना है,
सम्पूर्ण आजादी लाना है ।

बिन माँ का बच्चा रोता है,
माता पिता बस बोझा है।
औरत की अस्मत बिकती है,
इनसान की कीमत सस्ती है।
रिश्ता पैसों से बनता है,
ये कैसी सभ्यता संस्कृति है।
ये कैसी देश की झाँकी है,
बदलाव अभी भी बाकी है।
कुछ करके दिखलाना है,
सम्पूर्ण आजादी लाना है।

गंगा मैली रोती है,
हवा बहुत प्रदूषित है।
फैली हुई महामारी है,
भ्रष्टाचार और लाचारी है।
नारी की इज्जत लुटती है,
प्रकृति फूट के रोती है।
ये कैसी देश की झाँकी है,
बदलाव अभी भी बाकी है।
कुछ करके दिखलाना है,
सम्पूर्ण आजादी लाना है।

निर्दोष शूली पर चढ़ता है,
अपराधी निर्भय हो घूमता है ।
कोट – कचहरी लम्बी चक्की है,
कानून के आँखों पर पट्टी है ।
न्याय जल्दी नहीं मिलता है,
ये कैसी संविधान की नीति है।
ये कैसी देश की झाँकी है,
बदलाव अभी भी बाकी है ।
कुछ करके दिखलाना है,
सम्पूर्ण आजादी लाना है ।

माना चाँद पर पहुँच गई बेटी,
फिर भी गर्भ में है मरती।
दहेज की भट्ठी में जलती,
भेद-भाव का दंश सहती।
जिस देश में नारी पूजी जाती है,
वहीं नारी की क्यों ऐसी स्थिति है?
ये कैसी देश की झाँकी है,
बदलाव अभी भी बाकी है।
कुछ करके दिखलाना है,
सम्पूर्ण आजादी लाना है।

क्या इसी दिन के लिए,
फाँसी पर चढ़े स्वतंत्रता सेनानी।
कितनों ने दे दी अपनी कुर्बानी।
क्या ऐसी ही भारत का सपना,
देखें थे नेहरू और गाँधी जी।
एक बार तो सोचो देशवासी,
होगी तुम्हें ग्लानि…… ।
ये कैसी देश की झाँकी है,
बदलाव अभी भी बाकी है ।
कुछ करके दिखलाना है,
सम्पूर्ण आजादी लाना है ।
—लक्ष्मी सिंह 🌹

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