ये अनोखे रिश्ते

pratik jangid

रचनाकार- pratik jangid

विधा- कहानी

ये हीचकिया भी ना न जाने किसकी यादो की दस्तक आज सुबह सुबह ही दे रही है. माँ कब से कह रही है की पानी पिले ।।मगर मे हु की कब से चाय का कप लेकर बालकनी मे खड़ी हुई इस शांत हवा के साथ गुनगुना रही हु।। मे खुद मे व्यस्त थी ही के माँ जोर से बोलती हुए बालकनी तक आगयी । ओर कहने लगी ऋषिका मे कब से आवाज लगा रही हु ।ओर तु है की मेरी एक आवाज का एक जवाब तक नही दिया ।। आखिर तुझे हो क्या गया है ।

न किसी से ज्यादा बोलती है न साथ मे खाना खाती है ना घर से बाहर न कही घूमने दोस्तो के पास जाती है ।। न तेरे चहरे पर वो मुस्कुराहट है। तु कुछ बोलेंगी एसे ही चुप चाप खड़ी रहेंगी । अब जल्दी से तैयार हो जा तेरे पापा के दोस्त महेश uncle के यहां खाना खाने जाना है । ओर जल्दी से नीचे आज तेरे पापा तुझे बुला रहे है । मे कुछ कहती इतने माँ नीचे चली गयी..आज बिल्कुल भी कही जाने का मन नही था महेश अंकल के घर जाने का सुनते ही मुझे थोड़ा गुस्सा आने लग गया पिछली रात ही कॉफी शॉप पर वैभव से झगड़ा जो हो गया था तो क्यु जाउ उसके घर आखिर उसने ही तो कहा था ना के मुझसे बात मत करना ।। तो फिर क्यों जाउ मे शायद ये खाने पर बुलाने का प्रोग्राम भी वैभव का ही होगा ।वैभव पापा क ओफिस frnd का ही मित्र था एक ओफिस पार्टी मे मिलवाया था पापा ने हम सब को बस तक से हम एक दूसरे से मिलने लग गये कभी कॉफी शॉप कभी, टोकिज , कभी चिल्ड्रन पार्क, बस थीरे थीरे हम क्लोस बन गेये । मे कुछ ओर सोच ही रही थी की पापा की आवाज सुनाई दि मे जल्दी से आई पापा कहकर निचे चली गई पापा बोले ऋषिका तुम अभी तक तैयार नही हुई ।हम लेट हो रहे है ।पापा कुछ ओर कहते इतने मेने पापा से मना कर दिया पापा मुझे कही नही जाना आप लोग चले जाईये ।इतना कहकर मे अपने कमरे मे चली गयी । अपने मोबाइल को देखा तो 2 मिस कॉल ओर 5 sms वेभव क थे ।जिनमे लिखा था । soory for last night . बोलना तो मे भी चाह रही थी पर ।कोई मुझे हर बात पर मुझे ब्लेम करे मुझे अच्छा नही लगता । मे भी आपनी ज़िद पर अडि रही sms ओर कॉल्स के कोई जवाब नही दिये । मम्मी पापा को जाये अब तक पूरे 15 मिनट हो चुके थे । मे किचन की ओर जाने ही वाली थी की न्यू नंबर से कॉल आया मेने जैसे ही फोन उठाया ओर हलो क साथ ही सामने से वैभव की आवाज आई सुनो मे 10 मिनट मे तुम्हरे घर पहुच रहा हु तैयार हो जाना । इतना कहकर उसने फोन काट दिया । खुद की सोच मे ही उलझ गयी की अब क्या करु । यही सोचते मे नहाने चली गयी । इतने दरवाजे पर दस्तक हुई मे जल्दी तैयार हो कर दरवाजा खोला की सामने वैभव एक फूलो का गुलदस्ता ओर उसमे एक sory कार्ड ओर हाथ मे बहुत सारे baloon लेकर सामने खड़ा था उसने मुझे फूल दिया ओर जोर से गले लगा लिया ओर कान मे soory कहकर कान पकड़कर खड़ा हो गया उसके इतना कुछ कर लेने के बाद मे खुद को रोक नही पायी ।ओर मे हल्की सी मुस्कुरा दि ।उसने मुझे अपने साथ चलने को कहा ।मे तैयार हो कर उसकी कार ने बैठ गई । 5 मिनट बाद हम दोनो उसके घर पर थे । वहा जाकर देखा तो सब लोग गेट पर ही खड़े थे । मे अपने आप को समेट ति हुई आँखे नीचे झुकाकर अंकल aunti के पैर छुए , इतने महेश अंकल मेरे पापा से बोले , शर्मा जी हमे ऋषिका पसंद है । आगे बात करे । बस इतनी सी थी ये कहानी ,,,

By pratik jangid

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