यूँ भीख में लेना भी मंज़ूर न था…..

suresh sangwan

रचनाकार- suresh sangwan

विधा- गज़ल/गीतिका

यूँ भीख में लेना भी मंज़ूर न था
मुहब्बत में इतना भी मजबूर न था

ये ज़िंदगी मेरी रोशन थी उससे
अगरचे वो चमकता कोहिनूर न था

आबादियों ने क्या दी पहचान ए दिल
बर्बादियों से पहले मशहूर न था

है कौन सी सूरत महबूब तिरी ये
मेरा सनम तो इतना मगरूर न था

इश्क़ बिन भी जितनी ज़िंदगी गुज़री
था ज़ायक़ा उसमें पर भरपूर न था

परवाह थी बिजली और तूफ़ान की
बरसात में जीने का शऊर न था

जितना समझते थे आप मुझे हरदम
मगर इतना भी तुमसे मैं दूर न था

हसरत भरा ये दिल खाली कर डाला
इस तर ह मैं हल्का कभी हुज़ूर न था

——–सुरेश सांगवान 'सरु'

बेहतरीन साहित्यिक पुस्तकें सिर्फ आपके लिए- यहाँ क्लिक करें

Views 10
इस पेज का लिंक-
Sponsored
Recommended
Author
suresh sangwan
Posts 230
Total Views 2.1k

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देंं


Sponsored
हिंदी साहित्यपीडिया का फेसबुक ग्रुप ज्वाइन करें और जुड़ें दुनिया भर के साहित्यकारों एवं पाठकों से- facebook.com/groups/hindi.sahityapedia
2 comments